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कुंदरू (kundru) की खेती भारत में कई जगह की जाती है। आपने आज तक जमीन पर खेती करने वाले बहुत किसान देखे होंगे। लेकिन आज हम आपको मिलवा रहे हैं, एक ऐसे प्रगति सील किसान दंपत्ति से। जिसने अपनी खेती में पंडाल प्रणाली का यूज कर बहुत अच्छी उपज प्राप्त की और सामान्य से ज्यादा मुनाफा कमाया।
भारत में कुंदरु को ज्यादा लोकप्रिय नहीं है, लेकिन कुछ मंडियों में इसकी मांग बहुत अधिक रहती है। इसी मांग को देखते हुए भारत में कई जगहों पर किसानों ने इसकी व्यवसाय खेती शुरू कर दी है। सामान्य तौर पर किसान कुंदरू के जमीन पर लगाकर खेती करते हैं। लेकिन वही कुछ किसान कुंदरू की खेती में नए-नए प्रयोग करते रहते हैं। जिसमें कुंदरू को किसी पेड़ या किसी बांस, दीवाल के सहारे ऊपर चढ़ा दिया जाता है।
कुंदरू का पौधा बेलदार होता है। जिससे वह आसानी से दीवार, लकड़ी और पेड़ों पर अपनी लताओं को फैला देता है। कुंदरू को उगाने का सही समय वेसे तो पूरे साल ही है। लेकिन यह ठंडी जगह पर पूरे वर्ष फल नहीं देती। मिट्टी की बात करें, तो यह सभी प्रकार की मिट्टियों में आसानी से उगाई जा सकती है। लेकिन बलुई दोमट मिट्टी इसके लिए बढ़िया होती है। सीड की बात करें, तो इसे उगाने के लिए हम कटिंग का इस्तेमाल करते हैं।
कुछ लोग स्थाई पंडाल लगाते हैं, जिसमें लोहे के एंग्लो के द्वारा एक स्थाई पंडाल तैयार की जाती है। जिस पर कुंदरू की फसल ली जाती है। वहीं दूसरी ओर जिन किसानों का बजट थोड़ा कम होता है। वह अर्ध स्थाई पंडाल पद्धति को अपनाकर कुंदरू की खेती (Kundaru Farming) करते हैं।
ऐसा ही किया हैं आंध्र प्रदेश के नरसारावपेट मंडल के गांव मुल्कालूरु के रहने वाले एक किसान दंपत्ति आदिनारायण रेड्डी और सुशीला ने। ये पिछले 30 साल से सब्जियों की खेती में अपना योगदान दे रहे हैं। इसी के साथ वो खेती में नए-नए प्रयोग करते रहते हैं। उनके पास अपनी खुद की 3 एकड़ जमीन है, जिसमें वह अलग-अलग तरह की सब्जियां समय-समय पर लगाते रहते है।
वह कुछ भाग में कुंदरू (Coccinia Ivy Gourd) 1 एकड़ में तुरई और 1 एकड़ में करेले की खेती करते हैं, पहले सुशीला और आदित्यनारायण रेडी सब्जियों की फसलों को जमीन से ही लिया करते थे। फिर उन्होंने खेती में लगने वाले निवेश को कम करने के लिए छोटे बांस का इस्तेमाल करना शुरू किया। लेकिन छोटे बाँसों का इस्तेमाल करने से मजदूरों को फसलों की कटाई करते समय दिक्कत आने लगी।
दूसरी दिक्कत बरसात के मौसम में छोटे बांस जमीन में गल जाया करते हैं, इसी कारण सुशीला और आदित्य नारायण रेडी ने अपने खेती में उत्पादन बढ़ाने और मेहनत को कम करने के लिए। बैंक से 200000 का लोन लिया और स्थाई पंडाल बनवाएं।
इसी बीच उन्होंने एक ट्रेनिंग प्रोग्राम में उन्हें अर्ध स्थाई पंडाल बनाने की विधि भी सीख ली। लेकिन उससे पहले ही वह 200000 Ru से पंडाल बनाने के लिए लोन ले चुके थे। इसीलिए उन्होंने आंध्र प्रदेश जल क्षेत्र सुधार परियोजना के तहत मिलने वाली सब्सिडी का लाभ लिया और दूसरे खेतों के लिए 30000 Ru की लागत से अर्ध स्थाई पंडाल बनवाए जिससे उनके खेती में उत्पादन में बहुत जबरदस्त बढ़ोतरी प्राप्त हुई। जहां वह एक एकड़ से 20 टन उत्पादन लेते थे।

वही अर्ध स्थाई प्रणाली लगाने से उनका उत्पादन दोगुना यानी 40 टन हो गया कुंदरू की खेती (kundaroo
Ki Kheti) में प्रति एकड़ लागत करीबन 200000 Ru आती है, वही 40 टन माल निकलने पर करीब 300000 Ru की आमदनी प्राप्त होती है। इस हिसाब से प्रति एकड़ 100000 Ru का मुनाफा प्राप्त होता है।
सुशील रेडी को 2010 में जिला कलेक्टर द्वारा सर्वश्रेष्ठ महिला किसान का पुरस्कार भी मिल चुका है। आजकल सुशीला रेड्डी दूसरे किसानों को भी अर्थ स्थाई पंडाल पद्धति अपनाने की सलाह देती है और उन्हें सिखाती भी हैं, लेकिन इसमें बांस के खंभों को हर 2 साल बाद बदलने की जरूरत पड़ती है।



