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Delhi: वो कहने है न की सच्ची मेहनत की डोर सफलता से बंधी होती है और मेहनत हरने वाले ही कभी हार नहीं होती। यह कहानी है किशोर कुमार रजक की, जिन्होंने अपने मेहनत और लगन की दम पर एक छोटे से गाँव से एक बड़े अफसर बनने का सफर तय किया है। आज इनके नाम से इनके गाँव का बच्चा बच्चा प्रेरणा पाता हैं।
किशोर कुमार रजक (Kishor Kumar Rajak) की सफलता की कहने, मेहनत और सफलता की मिसाल है। किशोर कुमार रजक एक समय में कभी बकरियां चराया करते थे। ईंट-के भट्टों पर करते थे मजदूरी। अपने कॉलेज में फेल भी हुए, मगर अपना अफसर बनने का सपना हमेशा कायम रखा। अपनी मेहनत में कोई कमी कोई भी कसर नहीं छोड़ा और उसके बाद पहले ही प्रयास में यूपीएससी (UPSC) परीक्षा को क्रैक करके खुद को साबित कर दिया।
किशोक कुमार रजक झारखंड (Jharkhand) के बोकारो जिले में चंदनकेर विधानसभा गांव बुड्ढीबिनोर के रहने वाले हैं। धनबाद की कोयला खदान में मजदूर दुर्योधन और उनकी बीवी रेणुका देवी के घर साल 1986 को जन्म हुआ किशोर कुमार का उनके चार भाई और एक बहन है और वो उनसब में सबसे छोटे थे। और आज राजधानी रांची से लगभग 30 KM दूर खूंटी जिले में झारखंड पुलिस DSP के Post पे कार्यरत हैं।
कोरोना से कल क्या होगा कोई नही जनता।लेकिन भरोसा दिलाता हूँ अपने क्षेत्राधिकार में 100% न्याय दिलाऊँगा।किसी का कोई धौंस नही,गुण्डागर्दी नही,दबंगई नही,आम जनता से कोई बदमाशी नही,बख्तमीजी नही चलेगा।माता-पिता और ईश्वर की कसम ! कोई पैसा नही,कोई पैरवी नही।जो सच है उसका न्याय होकर रहेगा। pic.twitter.com/cpLwil8HIm
— Kishore Kumar Rajak (@dspkishor) May 3, 2021
मीडिया रिपोर्ट्स में किशोर कुमार कहते हैं कि उनका बचपन बहुत ही गरीबी में बीता। उनके घर में बिजली तक नहीं थी। उन्होंने दीया और लालटेन की रोशनी में अपनी पढाई को पूरा किया। गांव के खेतों में धान रोपने के बाद पशुओं के चरने के लिए जगह तक नहीं बचती थी। तो ऐसे में किशोर कुमार अपने सभी दोस्त निरंजन, वरुण, सबल आदि के साथ घर से तीन-चार किलोमीटर दूर काफी घने जंगलों में बकरियां और बैल को चराने के लिए जाया करते थे और इनका यह सिलसिला खेत खाली होने तक जारी रहा।
किशोर कुमार बताते हैं कि बकरियां को चराने के साथ ही साथ ईंट-भट्टों पर भी मजदूरी करने वाले वो मुश्किल दिन वो कभी नहीं भूल सकता। अपने चाचा जी के साथ ईंट-भट्टों पर मजदूरी करने जाते थे। आज भी मुझे याद है की उस वक्त भट्टे पर एक हजार ईंट निकालने के सिर्फ चार रुपए और रोड में ईंट भरने के सिर्फ 12 रुपए ही मिलते थे। उस वक्त सोचा भी नहीं था कि एक दिन कभी अफसर बन सकूंगा, मगर मेरे टीचर की सीख ने मेरी पूरी ज़िन्दगी बदल दी। मेरे टीचर ने बोला था कि अगर मजदूरी करोगे तो मजदूर ही बनोगे और मेहनत से पढोगे तो एक अफसर बनोगे।
माँ😊 pic.twitter.com/tBIoZBQLa5
— Kishore Kumar Rajak (@dspkishor) May 9, 2021
किशोर कुमार जी की पढ़ाई गांव के एक सरकारी स्कूल से ही शुरू हुई और वो सरकारी स्कूल जिसकी छत टपकती थी और वह एक ही कमरे में सभी पांच कक्षाओं के बच्चे एक साथ बैठकर साथ में पढ़ाई किया करते थे।अपने स्कूल की पढ़ाई को पूरा कर किशोर ने साल 2004 में इग्नू से इतिहास विषय में स्नातक के लिए दाखला लिया और साल 2007 में एक सेमेस्टर में वो फेल हो गए तो उनका हौसला टूटा, लेकिन फिर अपनी मेहनतसे साल 2008 में स्नातक की डिग्री को लिया।
डिग्री लेने के बाद किशोर कुमार रजक अपनी UPSC की तैयारी के लिए दिल्ली आना चाहते थे, मगर अपनी आर्थिक गरीबी से खुदको रोक लीया। उस वक्त इतना बुरा दिन था की मेरे जान-पहचान वाले ने उधार कुछ रुपए तक मुझे नहीं दिए। फिर मेरी बड़ी बहन जिनका नाम पुष्पा देवी है, उन्होंने अपन गुल्लक तोड़ा। उसमें उनके जमा किये 4 हजार रुपए निकले और उन्होंने मुझे दि। फिर मै वो पैसे लेकर दिल्ली के लिए चल दिया। उसके बाद सीधा अपनी UPSC की परीक्षा के लिए लग गया।
मेरे प्रभु, भगवान मेरे माँ-पिताजी ही हैं। pic.twitter.com/Hq2QC0JzTc
— Kishore Kumar Rajak (@dspkishor) May 1, 2020
एक अफसर बनने का सपना लेकर वो झारखंड से दिल्ली आये और फिर किशोर कुमार यहां नेहरू विहार व गांधी विहार में एक किराए के मकान में रहते थे। अपनी यूपीएससी की कोचिंग का खर्च निकालने के लिए वो अपने मकान मालिक के बच्चों को पढ़ाया करते थे। फिर उसी बीच यूपी के बनारस में रेहनी वाली वर्षा श्रीवास्तव भी किशोर कुमार के साथ ही यूपीएससी की कोचिंग साथ में किया करती थीं। पहले दोनों में अच्छी दोस्ती हुई, फिर वो दोस्ती धीरे-धीरे प्यार में बदल गई। उसके बाद दोनों ने नवंबर साल 2017 में प्रेम विवाह किया। दोनों का आज एक बच्चा भी है।
एक बड़ा अधिकारी बनने का बड़ा सपना लेकर दिल्ली आए किशोर कुमार ने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर UPSC परीक्षा को साल 2011 पहले ही प्रयास में 419 रैंक से पास कर ली, लेकिन वो आईएएस या आईपीएस तो नहीं बन पाए, लेकिन सशस्त्र सीमा बल (SSB) के असिस्टेंट कमांडेंट की नौकरी मिल गयी। फिर साल 2013 में उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में सशस्त्र सीमा बल के असिस्टेंट कमांडेंट की एक साल की ट्रेनिंग में चले गए।
उस वक्त किशोर कुमार को ये अहसास हुआ कि उन्हें अफसर बनकर अपने ही स्टेट के लोगों की सेवा करनी है। उसके बाद उन्होंने 6 महीने बाद ही अपनी ट्रेनिंग को बीच में छोड़कर वापस से दिल्ली चले गए और एक बार फिरसे यूपीएससी की तैयारियों में लग गए। साल 2015 में साक्षात्कार पहुंचे, मगर इस बार उनका चयन नहीं हुआ।
फिर वो अपने ही राज्य में एक अफसर बनने के सपने को लेकर किशोर कुमार दिल्ली से झारखंड वापिस लौट आए और एक कोचिंग संस्थान में भी पढ़ाने लगे। और साथ ही साथ स्टेट पीसीएस की तैयारियों में भी वो लग गए। साल 2016 में इन्होंने वो स्टेट पीसीएस परीक्षा को अपनी कड़ी मेहनत से पास कर लिया और झारखंड पुलिस में डीएसपी बने।




