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Delhi: हर इंसान का जीवन संघर्षों से भरा होता है, संघर्ष जीवन का दूसरा नाम होता है। कोई भी व्यक्ति अगर अपने मन में कुछ बनने की जिद पकड़ लेता है तो वो कर के दिखता है। उसकी जिद वो मुकाम हासिल कर लेती है। कामयाबी पाने के लिए बस जरूरी है कि पूरी इच्छाशक्ति और मेहनत के साथ काम किया जाए।
सफलता उसे ही प्राप्त होता है जो कड़ी मेहनत और लगन से अपने मंज़िल को पाने की इक्छा रखे। ऐसा ही कुछ करके दिखाया मनीराम शर्मा ने। मनीराम शर्मा जिनके पिता मजदूरी कर अपना जीवन यापन करते थे, और मां दृष्टिहीन थीं। गरीबी से जूझ रहे परिवार में खुद मनीराम शर्मा बहरेपन का शिकार थें।
उन्हें सुनाई नहीं देता था। ऐसे इंसान ने हौसला ना हारते हुए यूपीएससी की परीक्षा दी। लगनशील और मेहनतकश मनीराम ने राज्य शिक्षा बोर्ड की परीक्षा में पांचवां और बारहवीं की परीक्षा में सातवां स्थान प्राप्त किया। एक बार मनीराम शर्मा ने खुद बताया था कि जब उनके दोस्तों ने घर पर आकर उन्हें और उनके पिता को बताया कि वो दसवीं पास कर गए हैं, तब पिता काफी खुश थे।
वो मनीराम शर्मा (Maniram Sharma) को लेकर एक विकास पदाधिकारी के पास पहुंचे और बोले की दसवीं सफल हो चुका है। इसे चपरासी की नौकरी लगा दो। उस समय बीडीओ ने कहा था कि ‘ये तो सुन ही नहीं सकता। इसे न घंटी सुनाई देगी न ही किसी की आवाज। ये कैसे चपरासी बन सकता है, पिता की आंखों से आंसू निकल गए।’ मनीराम शर्मा ने सपने पूरे करने के लिए 15 साल संघर्ष किया।
इसके साथ, मनीराम ने न केवल व्यक्तिगत लड़ाई जीती है, बल्कि उनके जैसे विकलांग व्यक्तियों के लिए एक मील का पत्थर जीत लिया है, जिन्हें प्रमुख सरकारी सेवा से दूर रखा गया है। पिछले कुछ वर्षों में टीओआई द्वारा मनीराम के मामले को उजागर किया गया है, कैसे उनके प्रयासों को एक या दूसरे आधार पर विफल कर दिया गया, उनको सुनाई नही देने के कारण जब तक वो सही से समझ नही लेते तब तक उनको मौखिक परीक्षा देने पड़ा।
उन्होंने इस बार अपना आईएएस साक्षात्कार मौखिक रूप से दिया। प्रश्नोत्तर देने के बाद भी उनका सेवा में चयन ही नहीं हो रहा था। जबकि अन्य सफल उम्मीदवारों का उनके पास फोन आया, उनको सफलता नही मिली। कई बार प्रयास करने के बाद उन्हें सूचित किया गया कि उन्होंने सभी मामलों में परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है, लेकिन फिर भी उन्हें अपनी नियुक्ति के लिए एक और महीने का इंतजार करना पड़ा।
मुझे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा है कि ऐसा हो गया है। यह हारा नहीं है। इतनी निराशाओं को झेलने के बाद यह कल्पना करना मुश्किल है कि यह वास्तव में सच हो गया है। मनीराम की आईएएस की शुरुआत 1995 में शुरू हुई जब वह प्रारंभिक परीक्षा को पास करने के अपने पहले प्रयास में असफल रहे।
आप श्री मनीराम जी शर्मा IAS उपायुक्त मेवात हरियाण#Happy Bday! pic.twitter.com/g6ulFINgX6
— Shreha (Sankalp Inst) (@shreha211985) March 16, 2016
वह तब 100% बहरे थे। तब से उन्होंने तीन बार 2005, 2006 और 2009 में परीक्षा पास की है। 2006 में, उन्हें बताया गया कि उन्हें आईएएस परीक्षा में बैठने नही दिया जाएगा, क्योंकि उसमे केवल आंशिक रूप से विकलांग ही पात्र थे, उनके जैसे पूरी तरह से बधिर व्यक्ति नहीं। इसलिए उन्हें पोस्ट और टेलीग्राफ खाते और वित्त सेवा नोकरी दी गई।
अपना हौसला ना हारते हुए मनीराम शर्मा ने अपने पिता से कहा था कि वो ‘मुझ पर विश्वास रखो, पास हुआ हूं तो एक दिन बड़ा अफसर ही बनूंगा।’ किसी तरह मनीराम के प्रधानाध्यापक ने उनके पिता को राजी कर लिया कि वो अपने बेटे को आगे की पढ़ाई के लिए बाहर भेजेंगे।
अलवर के एक कॉलेज में एडमिशन मिलने के बाद मनीराम ने यहां ट्यूशन पढ़ाकर आगे की पढ़ाई की और राज्य की लिपिक वर्ग की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए। उन्हें पीएचडी करने के लिए एडमिशन मिल गया। पीएचडी करने के बाद आईएएस अफसर बनने की ठानी।



