
Photo Credits: Ahmed Anwar (The Hindu Newspaper)
गरीबी क्या होती है, इसका अनुभव तो एक गरीब ही बता सकता है। गरीबी होने के कारण बच्चे पढ़ नही पाते है। गरीब परिवार में इतना पैसा नही बचा पाते है की वो जोड़कर अपने बच्चों को शिक्षा प्रदान करवा सके। गरीबी में बच्चे शिक्षा से दूर हो जाते है। इसी कड़ी में एक शख्स ऐसे है जिन्होंने सबके लिए एक मिसाल कायम की।
कर्नाटक में मंगलोर के रहने वाले हरेकला हजब्बा है। वो भी गरीबी के कारण पढ़ नही पाये, अनपढ़ है। लेकिन उन्होंने गरीब बच्चों को पढ़ने के लिए संकल्प लिया है। वो बहुत गरीब थे, उन्होंने अपनी जिंदगी में बहुत मेहनत की लेकिन उन्होंने किसी मे सफलता हासिल नही हो पा रही थी। फिर उन्होंने संतरे बेचने का काम शुरू किया।
गरीब व्यक्ति भी समाज सेवा कर सकता है
जिसको करके उनको जो भी पैसा मिलता, उसको जोड़ते जा रहे थे। लेकिन उनके पास इतना पैसा नही आ पा रहा था कि वो अपने सपनो को पूरा कर सके। इसके लिए उन्होंने बड़े लोगो से मदद लेने के लिए विचार किया। लेकिन इसमें भी उनको सफलता हासिल नही हुई। किसी ने उनकी मदद नही की उनके काम मे। वो समाज के कल्याण के लिए आगे आ रहे थे।
Fruit vendor Harekala Hajabba's building of school from savings proves how #dedication & #perseverance give #success pic.twitter.com/C4WPO1cRGY
— Samir Dattopadhye (@samirsinh189) February 24, 2016
एक रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने 30 साल तक संतरे बेचकर पैसा जोड़कर अपने सपनो को पूरा करने की पहल शुरू की। गरीब बच्चों के लिए स्कूल बनवाना उनको लक्ष्य था। मैंगलोर से करीब 25 किलोमीटर दूर हरेकला में नई पपडु गांव के निवासी है। वह अपने गांव के लिए किसी महान इंसान से कम नही है। उनको अपने गांव में अक्षरा सांता के नाम से पुकारा जाता है।
हजब्बा बहुत ही गरीब परिवार से थे, सबसे पहले उन्होंने बीड़ी बनाने का काम शुरू किया। फिर उन्होंने संतरे बेचने का काम शुरू किया जिससे उनको अपने सपने को पूरा करने का रास्ता मिल गया। वो नही चाहते थे जिस कठिन परिस्थितियों का उन्होंने सामना किया है कोई दूसरा करे। गरीब बच्चों को देखकर प्रण लिया कि वो उन बच्चों को शिक्षा दिलवाएंगे।
Even if it meant his own children did not get three meals a day, Harekala Hajabba saved the money he got selling oranges on the streets of Mangalore and ended up building a school for the poor children of his village.https://t.co/okR0wrUVl9#KindnessMatters pic.twitter.com/xEEPfHNqri
— Doctor Roshan R 🌍 (@pythoroshan) March 19, 2019
उनके परिवार में उनकी पत्नी और उनके 3 बच्चे थे। उनकी पत्नी पहले तो उनके इस काम मे साथ नही दे रही थी लेकिन धीरे धीरे फर उनकी पत्नी ने भी उनका साथ दिया।सबसे पहले उन्होंने अपने गांव में एक मदरसे की शुरुआत की जिसमे 20 से अधिक विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। फिर धीरे धीरे विद्यार्थियों की संख्या में बढ़ोतरी होने लगी।
United Christian Association donated the house worth Rs 15 lakh to 'Saint of Letters' Harekala Hajabba on Sunday. pic.twitter.com/rxnFA38rYb
— Vinobha KT (@KTVinobhaTOI) February 7, 2016
हजब्बा को लगा अब जल्द ही मदरसे को स्कूल में बदलना होगा। जिससे अधिक से अधिक बच्चे शिक्षा प्राप्त कर सके।हजब्बा ने एक जमीन खरीदी लेकिन वो स्कूल बनाने के लिए काफी नही थी। जितना भी पैसा उन्होंने जोड़ा था वो स्कूल बनाने के लिए बहुत कम था। फिर धीरे धीरे उन्होंने पैसा इकट्ठा करके एक छोटे से स्कूल का निर्माण किया।
कन्नड़ अखबार ने हजब्बा की कहानी को प्रकाशित किया। फिर CNN IBN ने उनके हौसले के लिए उनको पुरुस्कार से सम्मानित किया। और स्कूल बनाने के लिए 5 लाख रुपये भी प्रदान किये। धीरे धीरे हजब्बा के पास पैसे देने वालो की लाइन लग गई। आज ऐसा समय है कि एक बड़ा स्कूल बनकर तैयार है।
Even if it meant his own children did not get three meals a day, Harekala Hajabba saved the money he got selling oranges on the streets of Mangalore and ended up building a school for the poor children of his village.



