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Delhi: सपने कभी गरीबी अमीरी से नही देखे जाते। हौसले बुलंद होना चाहिए। हिंदी माध्यम के हैं, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि ज्ञान का भंडार ना हो। ज्ञान के मामले में तो हिंदी माध्यम के किसी को भी टक्कर दे सकते हैं। ज्ञान अर्जित करने में भाषा कभी रुकावट नहीं बन सकती। यह कहना है वर्ष-2018 बैच के आईपीएस अनिरुद्ध सिंह का। उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा में हिंदी माध्यम अपनाकर 146वीं रैंक हासिल की थी।
अनिरुद्ध कहते हैं कि अपने भावों को प्रस्तुत करना हिंदी में काफी सरल लगा। बचपन से लेकर आज तक हर कदम पर मेरा मान बढ़ाया। बचपन से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी तक हिंदी भाषा का साथ लेकर आगे बढ़ा। अपनी भाषा को लेकर कभी छोटा महसूस नही किया। बचपन से बड़े लोगो ने शिक्षा दी थी कि भाषा ज्ञान की मोहताज नहीं होती।
अनिरुद्ध (Anirudha Singh IPS) बताते हैं कि वे बिहार के उस जहानाबाद के हैं, जो इलाका नक्सलवाद के लिए जाना जाता है। उनका बचपन इसी डर के बीच गुजरा। वे बताते हैं कि परिवार के सभी लोग जिसमें वे खुद भी शामिल थे, छत पर सोते थे और जरा भी आहट होती थी, तो डर जाते थे कि कहीं उनके गांव पर किसी से धावा तो नहीं बोल दिया। इसी बीच वहां मिलिट्री का कैम्प लगा और जिससे परिस्थिति बदल गईं।
मिलिट्री कैम्प के कारण वहां अच्छी चहल-पहल रहती थी और लोगों के बीच एक सुरक्षा का अहसास भी कि वे लोग हैं तो अब कुछ नहीं होगा। लोगो के बीच डर खत्म होने लगा था। यही वो समय था जब अनिरुद्ध के मन में प्रशासन की तरफ झुकाव होना शुरू हो गया। उन्हें लगा कि यह क्षेत्र कितना अच्छा है, जहां के लोगों के पास होने से उनके गांव में सब कितने सुकून में हैं। वे बड़े होकर ऐसे ही किसी क्षेत्र में जाने की योजना बनाने लगे।
अनिरुद्ध के जीवन में एक कानपूर में रहते हुए घटना घटित हुई अनिरुद्ध के पिता ने कानपुर में अपनी मेहनत से जोड़े पैसो से एक रहने के लिए जमीन ली। मगर कुछ दंबग लोगो ने उनके पिता की वो जमीन अपने कब्जे में कर ली। अपनी जमीन को पाने के लिए उनके पिता पुलिस तक भी गए मगर दंबगो से पुलिस की मिली भगत के चलते पुलिस ने भी उनकी एक भी नही सुनी।
पिता ने अपना हौसला नही छोड़ा और वो ऊपर तक इस मामले का लेकर गए, तब पुलिस अधीक्षक महोदय ने उनकी सहयता की और दंबगो के कब्जें में पड़ी जमीन फिर से उनको दी गई। इस घटना के बाद अनिरुद्ध ने प्रशासनिक सेवाओं में जाने का फैसला किया अनिरुद्ध चाहते थे की कोई भी व्यक्ति अपने अधिकारों से लाचार न हो उसे पूरी सहयता मिले। बस इस बात को लेकर वो निकल पड़े इसे सही साबित करने।
सफर के दौरान साल 2015 में अनिरुद्ध की शादी उनकी ही दोस्त आरती के साथ हो गई। आरती उत्तर प्रदेश के बी.डी.ओ पद पर पदस्थ थी। यूपीएससी को पाने का सपना आरती का भी अभी अधूरा था। आरती और अनिरुद्ध ने मिल कर इसे पूरा करने का मन बना लिया। दोनो मिलकर इसकी तैयारी में जुट गए। 1 साल बाद ही उनकी मेहनत रंग लाई और वो साल 2016 में आयोजित यूपीएससी परीक्षा में पास हुए।
आरती को इस परीक्षा में AIR के साथ 118 IPS का पद मिला मगर अनिरुद्ध इस परीक्षा में ऐएफएचक्यू ही हासिल कर पाएं ।
अनुरुद्ध का कहना है कि उनकी पत्नी उनके लिए बहुत बड़ी मार्ग दर्शक रही हैं। लगातार उनका साथ दिया है, कभी हौसला नही हारने दिया, वो आईपीएस हैं और इस वक्त हैदराबाद में ट्रेनिंग कर रही हैं।
मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक एक इंटरव्यू में अनिरुद्ध ने कहा कि हिंदी माधयम होने के कारण थोड़ी परेशानी होती है क्योंकि कंटेंट ठीक से नहीं मिलता, लेकिन अब कुछ स्थितियां बदली हैं। अब कुछ ऐसे इंस्टिट्यूट्स भी हैं जो हिंदी के नोट्स भी देते हैं।
अपनी काबयाबी के बारे में अनिरुद्ध ने कहा कि किसी भी परीक्षा में सफल होने के लिए लक्ष्य बनाना बहुत जरुरी है। साथ ही अनुरुद्ध ने अपनी पत्नी को भी धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि रास्ता दिखाने के लिए पत्नी का आभरी हूं। हौसले मजबूत बनाए रखने के लिए साथी का होना भी बहुत जरूर है। पत्नी का साथ हो या परिवार का।



