देश में अब गन्ने के भूस पर मशरूम की खेती होगी, छोटे कमरे से मशरूम की खेती शुरू करे

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Mushroom Farming At Home
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Bhopal: मशरूम उत्पादन के लिए न तो जमीन की जरूरत पड़ती है और ना ही विशेष सामान की। पराली जैसे वेस्ट में भी इसे उगाया जा सकता है। छोटे कमरे में किसान इसकी खेती कर सकते हैं। हिमाचल के किसान (Farmer In Himachal) भी इसे आय का साधन बना रहे हैं।

देश के एकमात्र खुम्ब अनुसंधान केंद्र चम्बाघाट के वैज्ञानिकों ने तीन वर्ष के कड़े शोध के बाद गन्ने के भूससे (Ganne ke Bhuse) खाद तैयार कर मशरूम (Mushroom) का उत्पादन किया है। लिहाजा खुम्ब अनुसंधान केन्द्र चम्बाघाट के वैज्ञानिकों की मेहनत रंग लाई है। अनुसंधान के वैज्ञानिकों ने गन्ने के भूसे में मशरूम (Mushroom in Sugarcane Straw) का सफल उत्पादन किया है।

इससे भूस की कमी तो दूर होगी ही, वहीं दूसरी तरफ देश के गन्ना बाहुल्य राज्यों में किसान कम लागत में बटन मशरूम उगा सकेंगे। गन्ने का भूस बेहद कम दाम में मिलता है, वहीं गेहूं का भूस महंगा मिलता है। इसका असर मशरूम की कंपोस्ट की कीमत पर भी पड़ता था।

किसानो को सस्ती कम्पोस्ट मिलेगी इसका असर उनकी आमदनी पर भी होगा। केंद्र ने कुछ समय पहले गुच्छी को उगाने में भी सफलता हासिल की थी। दुनिया में सबसे महंगी सब्जी के तौर पर पहचानी जाती है। कृत्रिम माहौल में इसे उगाना दुनिया भर में एक चुनौती रहा है।

बीमारियों का सबसे सस्ता इलाज

सोलन (Solan) में 1961 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीआर) ने 1961 में मशरूम (Mashroom) पर काम करना शुरू किया। 10 सितंबर 1997 को सोलन को मशरूम सिटी ऑफ इंडिया के खिताब से नवाजा गया। इसी शहर में मशरूम की दर्जनों किस्मों की खोज की गई। मशरूम में कुपोषण, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, शुगर विटामिन, कैंसर जैसी बीमारी से लड़ने की क्षमता होती है।

इनमें गनोडरमा, कोर्डिसेप्स, शिटाके मशरूम कई गंभीर रोगों को दूर करने में लाभदायक सिद्ध हो रही हैं। मशरूम में कुपोषण, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, शुगर विटामिन, कैंसर जैसी बीमारी से लड़ने की क्षमता होती है। इनमें गनोडरमा, कोर्डिसेप्स, शिटाके मशरूम कई गंभीर रोगों को दूर करने में लाभदायक सिद्ध हो रही हैं।

30 प्रजातियों को ईजाद कर चुका है DMR

2008 में इसे खुम्ब अनुसंधान निदेशालय(DMR) का दर्जा मिला। देश का एकमात्र खुम्ब अनुसंधान निदेशालय पिछले 6 दशकों के सफर में डीएमआर (मशरूम अनुसंधान निदेशालय) मशरूम की 30 प्रजातियों को ईजाद कर चुका है। आज भी यहां मशरूम की दर्जनों प्रजातियों पर रिसर्च का काम जारी है। यहां मशरूम की ऐसी किस्में (Types Of Mushroom) तैयार की जा रही हैं, जो 12 डिग्री से 32 डिग्री तापमान में उगाई जा सकती हैं।

मेडिसनल वाली प्रजातियां

मेडिसनल प्रयोग में कामयाब मशरूम कई प्रजातियां यहां विकसित और ईजाद की गई हैं। खुम्ब अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ वीपी शर्मा बताते हैं कि, पिछले 5 से 10 सालों में जिस तरह से मशरूम के क्षेत्र में खुम्ब अनुसंधान के वैज्ञानिकों ने जो काम किया वह काबिले तारीफ है। अब तक मेडिसिनल प्रयोग के लिए 8 से 10 मशरूम की प्रजातियां ईजाद यहां हो चुकी है। यह प्रजातियां एड्स, कैंसर, सांस लेने में परेशानी और लीवर जैसी बीमारियों के लिए फायदेमंद मानी जाती हैं।

संजीवनी बूटी बनी कोर्डिसेप्स मिलटेरियस मशरूम

कोर्डिसेप्स मिलटेरियस मशरूम (Cordyceps Milterius Mushroom) शारीरिक क्षमता को बढ़ाने में कारगर सिद्ध है। यह मशरूम बाजार में करीब ढाई से तीन लाख रुपये प्रति किलो बिकता है। इस मशरूम के मानव शरीर के लिए कई फायदे (Benefits of Mushroom) हैं। आज के समय में कई लोग कैंसर, किडनी, फेफड़े की बीमारियों से जूझ रहे हैं। यह मशरूम ऐसे लोगों के लिए संजीवनी बूटी से कम नहीं है।

कॉर्डीसेप्स मिलटेरियस मशरूम खासतौर से थकान मिटाने और इम्यून सिस्टम को मजबूत करने के लिए भी जाना जाता है। यह मशरूम महिलाओं में कैल्शियम की कमी को दूर करने के लिए भी कारगर साबित हुई है। जानकारी के मुताबिक खुम्ब अनुसंधान केंद्र सोलन में वैज्ञानिकों को इस मशरूम पर शोध करने के लिए लगभग 6 साल से ज्यादा का समय लगा था। इसके बाद ही वैज्ञानिक मेडिसिनल मशरूम कोर्डिसेप्स को उगाने में सफल हो पाए थे।

दवाइयों में इस्तेमाल किया जाने वाला मशरूम

गैनोडरमा लूसीडम मशरूम (Ganoderma Lucidum Mushroom) प्रजाति की जाए तो इस मशरूम की बाजार में ज्यादातर मांग रहती है। इस प्रजाति का प्रयोग दवाइयों के रूप में ज्यादा किया जाता है। बाजार मे गैनोडर्मा कैप्सूल, गैनोडर्मा कॉफी और गैनोडर्मा टी जैसे प्रोडक्ट उपलब्ध हैं।

गैनोडरमा मशरूम खाने में कड़वा होता है, जिस कारण इसका उपयोग कैप्सूल के तौर पर किया जाता है। बाजार में इसकी कीमत आठ हजार से नौ हजार तक आंकी जाती है। गैनोडरमा लूसीडम मशरूम की यह प्रजाति कैंसर और एड्स जैसी बीमारियों जैसी बीमारियों से निजात पाने के लिए फायदेमंद मानी जाता है। वहीं ,यह मशरुम भी बॉडी के इम्यून सिस्टम को भी सही रखने में सक्षम है।

हिरेशियम मशरूम की इस प्रजाति को कोरल मशरूम के नाम से भी जाना जाता है। इसे ईजाद करने में खुम्ब अनुसंधान केंद्र को करीब 3 साल तक मेहनत करनी पड़ी। इसमें हीरेशियम की अधिक मात्रा पाए जाने के साथ-साथ यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को ठीक रखने और याददाश्त बढ़ाने में उपयोगी माना जाता है।

पेड़ के बुरादे से तैयार शिटाके मशरूम (Shitake Mushroom)

कैंसर से लड़ने के लिए जापान की अप्रूवड़ ड्रग लेन्टाइनन के मुख्य स्रोत और औषधीय गुणों से भरपूर शिटाके-388 एस मशरूम को घर मे ही 45 दिनों में उगाया जा सकता है। पेड़ के बुरादे से तैयार छोटे बैग्स में इस मशरूम को तैयार किया जाता है,जबकि पारम्परिक और अन्य विधियों से इस मशरूम को उगाने में 90 दिन लगते है।

यह मशरूम एंटी ऑक्सीडेंट, एंटी ऐजिंग के गुणों के साथ साथ विटामिन डी का भी अच्छा स्त्रोत है। बाजार में इसकी कीमत 500 रुपये किलो है। भारत में मशरूम का प्रयोग सब्जी के रूप में किया जाता है। खुम्बी की कई प्रजातियां भारत में उगाई जाती हैं। ढींगरी मशरूम स्वादिष्ट, सुगन्धित, मुलायम और पोषक तत्वों से भरपूर होता है। किसान आसानी से मशरूम की इस किस्म को लगाकर अच्छी खासी आमदनी कमा सकते हैं।

किसानों की मशरूम बारे में जा जानकारी देने के लिए खुम्ब अनुसंधान निदेशालय सोलन रोजाना देशभर में स्थापित 37 केंद्रों के माध्यम से 27 राज्यों की 27 भाषाओं में किसानों को मशरूम उत्पादन की जानकारी देता है। 27 राज्यों में अनुसंधान निदेशालय सोलन की विकसित तकनीकों का परीक्षण व अन्य कामों के लिए 23 समन्यवक और 19 सहकारी केंद्र हैं।

सालाना 2 लाख टन मशरूम का उत्पादन

आज देश भर में प्रतिवर्ष 1 लाख 90 हजार टन मशरूम का उत्पादन हो रहा है। हिमाचल में ही 15 हजार टन मशरूम का उत्पादन हो रहा है। आज देशभर में हर साल करीब 2 हजार करोड़ का कारोबार होता है। खुम्ब अनुसन्धान निदेशालय के निदेशक डॉ वीपी शर्मा बताते है कि देशभर में करीब 3 लाख किसान मशरूम की खेती करते हैं।

सालाना 2 लाख टन मशरूम का उत्पादन किया जाता है। जिसमें से 74 प्रतिशत व्हाइट बटन मशरूम, 12 प्रतिशत ढींगरी मशरूम, 12 प्रतिशत पेडिस्ट्रा मशरूम और बाकी का 2 प्रतिशत मिल्की और शिटाके मशरूम का उत्पादन होता है।

छह दशकों में 20 गुणा बढ़ा उत्पादन

अगर भारत में मशरूम उत्पादन (Mushroom ki Kheti) के इतिहास पर नजर डाली जाए तो 1962 से अब तक देश में मशरूम का उत्पादन 20 गुणा बढ़ चुका है। खासकर बीते 22 सालों से करीब 5 गुणा उत्पादन बढ़ा है। 1997 में मशरूम का उत्पादन 40 हजार टन था जो आज बढ़कर 2.25 लाख टन हो चुका है।

खुम्ब अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ वीपी शर्मा बताते हैं ‘एक रिपोर्ट के अनुसार अगर एक हेक्टयर जमीन में धान और गेहूं लगता है, तो प्रतिवर्ष किसान 50 हजार रुपये कमाई होती है। वहीं ,एक हेक्टेयर भूमि पर यदि मशरूम लगाया जाए तो किसान करीब एक करोड़ तक की आमदनी हो सकती है’। खुम्ब अनुसंधान निदेशालय का 60 साल का सफर बड़ा गौरवमयी रहा है और यह सफर निरंतर जारी है।

यहां हो रहे अनुसंधान और किसानों को दी जा रही जानकारियां किसानों के लिए लाभदायक सिद्ध हो रही हैं। इसी संस्थान की बदौलत भारत मशरूम उत्पादन (Mushroom Farming) में नई इबारत लिख रहा है और चीन और यूरोपीय देशों को पटखनी दे रहा है।

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