विश्व का सबसे बड़ा शिवलिंग कहा गया, यह शिव जी का रहस्यमई मंदिर अधूरा क्यों रह गया: रहस्य

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Bhojpur Temple Bhopal
Mysterious Bhojeshwar Temple of Bhojpur Madhya Pradesh. Bhojeshwar Temple Bhojpur Bhopal is World Heritage site. Reason Why Bhojpur Bhojeshwar temple is incomplete. The Tallest Lord Shiva Lingam is in the incomplete Hindu Temple Bhojpur MP.

Temple Photo Credits: Twitter

Bhopal, Madhya Pradesh: भारत (India) एक प्राचीन सभ्यता (Ancient Culture) वाला सांस्कृतिक देश हैं। यह विश्व के उन कुछ महत्वपूर्ण देशों में से एक है जहां हर वर्ग और समुदाय के लोग शांतिपूर्वक रहते हैं। यहां की भगौलिक स्थिति, जलवायु और विविध संस्कृति को देखने के लिए ही विश्व के कोने-कोने से पर्यटक पहुंचते हैं। वैसे अपनी भारत यात्रा के दौरान पर्यटकों को जो चीज सबसे ज्यादा पसंद आती है तो वह हैं, भारत की प्राचीन मंदिर।

मंदिरों की बनावट, विशेषता, महत्व और इतिहास आदि जानने के लिए ही पर्यटक बार-बार भारत घूमने आते है। इनमें से कई मंदिर तो ऐसे भी हैं, जो कई हजारों साल पुराने हैं और जिनके बारे में जानना पर्यटकों के लिए बहुत जरुरी हो जाता है। दुनियाभर में ऐसे कई मंदिर हैं, जो अपने आप में कई रहस्य समेटे हुए हैं।

खासकर भारत में तो ऐसे रहस्यमय मंदिरों (Mysterious Temples in India) की भरमार है। आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जो अधूरा है और प्राचीन भी। यह रहस्यमय और अद्भुत मंदिर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 32 किलोमीटर दूर भोजपुर (रायसेन जिला) में स्थि है। यहां भोजपुर की पहाड़ी (Bhojpur Hill) पर एक अद्भुत, विशाल, प्राचीन और अधूरा शिव मंदिर (Half Shiva Temple) है। यह भोजपुर शिव मंदिर या भोजेश्वर मंदिर (Bhojeshwar Temple) के नाम से प्रसिद्ध हैं।

इस प्राचीन शिव मंदिर (Ancient Shiva Temple) का निर्माण परमार वंश (Parmar Dynesty) के प्रसिद्ध राजा भोज (1010 ई-1055 ई) द्वारा करवाया गया था। यह शिव मंदिर 115 फीट (35 मी॰) लंबे, 82 फीट (25 मी॰) चौड़े तथा 13 फीट (4 मी॰) ऊंचे चबूतरे पर खड़ा है। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है, यहां का विशाल शिवलिंग, अपने-आप में अनूठे और विशाल आकार वाले इस शिवलिंग के कारण भोजेश्वर मंदिर (Bhojeshwar Temple) को उत्तर भारत का सोमनाथ मंदिर भी कहा जाता है।

आपको बता दे की लाल बलुआ पाषाण के बने इस शिवलिंग को एक ही पत्थर से बनाया गया है और यह विश्व का सबसे बड़ा प्राचीन शिवलिंग माना जाता है। आधार समेत शिवलिंग की टोटल ऊंचाई 40 फीट (12 मी॰) से अधिक है। यह शिवलिंग एक 21.5 फीट (6.6 मी॰) चौड़े वर्गाकार आधार पर स्थापित है। मंदिर से प्रवेश के लिए पश्चिम दिशा में सीढ़ियां हैं। गर्भगृह के दरवाजों के दोनों ओर नदी देवी गंगा और यमुना की मूर्तियां लगी हुई हैं।

गर्भगृह की अधूरी छत चार स्तंभों पर टिकी

मंदिर गर्भगृह के विशाल शीर्ष स्तंभ पर भगवानों के जोड़े स्थापित है, जो की शिव-पार्वती, ब्रह्मा-सरस्वती, राम-सीता एवं विष्णु-लक्ष्मी की मूर्तियां के तौर पर हैं। इसका विशाल प्रवेशद्वार का आकार अभी भारत के किसी भी मंदिर के प्रवेशद्वारों में सर्वाधिक विशाल है। इस मंदिर की एक अन्य विशेषता इसके 40 फीट ऊंचाई वाले इसके चार स्तम्भ हैं। गर्भगृह की अधूरी बनी छत इन्हीं चार स्तंभों पर टिकी है।

गुम्बदाकार छत वाला सबसे प्राचीन हिन्दू मंदिर है भोजपुर का भोजेश्वर मंदिर

भोजपुर के भोजेश्वर मंदिर (Bhojeshwar Temple of Bhojpur) की छत गुम्बदाकार हैं। कुछ विद्धान इसे भारत की प्रथम गुम्बदीय छत वाली इमारत मानते हैं। यह एक सबूत है कि भारत में मंदिर के गुम्बद निर्माण का प्रचलन इस्लाम के आने से पहले भी था। इस मंदिर का निर्माण भारत में इस्लाम के आगमन के पहले हुआ था। अतः इस मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बनी अधूरी गुम्बदाकार छत भारत में गुम्बद या शिखर निर्माण के प्रचलन का साफ़ प्रमाण है।

भोजपुर शिव मंदिर (Bhojpur Shiv Mandir) के बारे में एक दिल्शास्प बात यह है की मंदिर के चबूतरे पर ही मंदिर के अन्य हिस्सों, मंडप, महामंडप बनाने की योजना थी। ऐसा मंदिर के पास के पत्थरों पर बने मंदिर योजना से संबद्ध नक्शों से ज्ञात होता है। मन्दिर निर्माण की स्थापत्य योजना के नक्शे और अन्य विवरण पास के पत्थरों पर उकेरा गया है। जिनसे मंदिर-योजना के नक्शों को साफ़ देखा जा सकता है।

बताया जाता है की यहां एक वृहत मन्दिर परिसर बनाने की योजना थी, जिसमें ढेरों अन्य मन्दिर भी बनाये जाने थे। वास्तुविद मानते हैं कि यदि यह योजना सफलतापूर्वक सम्पन्न होती, तो यह मन्दिर परिसर भारत के सबसे बड़े मन्दिर परिसरों में से एक होता। मंदिर को देखकर आश्चर्य होता है कि आखिर इतने भारी पत्थर, इतनी ऊंचाई पर कैसे पहुंचाए गए, परंतु मंदिर के ठीक पीछे के भाग में एक ढलान बना है, जिसका उपयोग निर्माणाधीन मंदिर के समय विशाल पत्थरों (Big Stones) को ढोने के लिए किया गया था।

भोजपुर मंदिर में इसे प्रत्यक्ष प्रमाण के तौर पर देखा जा सकता है कि आखिर कैसे 70 टन भार वाले विशाल पत्थरों को मंदिर के शीर्ष तक पहुंचाया गया। पूरे विश्व में कहीं भी निर्माण हेतु सामग्री को संरचना के ऊपर तक पहुंचाने के लिए ऐसी प्राचीन भव्य निर्माण तकनीक अब दिखाई नहीं देती। यह मन्दिर ऐतिहासिक स्मारक के रूप में भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण विभाग के संरक्षण के अधीन है। मन्दिर के निकट ही इस मन्दिर को समर्पित एक पुरातत्त्व संग्रहालय भी बना है। शिवरात्रि के अवसर पर राज्य सरकार द्वारा यहां प्रतिवर्ष भोजपुर उत्सव का आयोजन किया जाता है।

भोजपुर के भोजेश्वर मंदिर का अनसुलझा रहस्य(Mystery of Bhojpur Shiv Temple)

मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के इस मंदिर में कुछ अनसुलझा रहस्य (Mystery) भी है। भोजेश्वर मंदिर का निर्माण अधूरा हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि निर्माण कार्य अचानक से ही रोक दिया गया होगा। इसका निर्माण अधूरा क्यों रखा गया, इस बात का इतिहास में कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है। फिर भी ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण एक ही रात में होना था, परन्तु छत का काम पूरा होने के पहले ही सुबह हो गई, इसलिए निर्माण अधूरा रह गया।

आपको बता दे की इतिहास के जानकरों के मुताबिक़ भोजपुर मंदिर का अधूरा रह जाना किसी प्राकृतिक आपदा, संसाधनों की कमी या किसी युद्ध के शुरू हो जाने के कारण ही हुआ होगा। शायद राजा भोज (Raja Bhoj) के निधन होने से भी इस प्रकार के निर्माण का रुकना हो सकता है। जानकरों का मानना है कि छत निर्माण किसी वास्तु दोष या निर्माण कार्य के ढह जाने के कारण रोका गया भी हो सकता है। तब राजा भोज ने इस दोष के कारण इसे पुनर्निर्माण न कर मन्दिर के निर्माण को ही रोक दिया होगा।

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जानकरों मानना है कि भोजेश्वर शिव मंदिर एक प्रकार का अंत्येष्टि स्मारक है। इस प्रकार के मन्दिरों को स्वर्गारोहण-प्रासाद कहा जाता था। इस प्रकार के मन्दिरों में एकल शिखर के स्थान पर परस्पर पीछे की ओर घटती हुई पत्थर की सिल्लियों का प्रयोग किया जाता है। उनके अनुमान के अनुसार राजा भोज (King Bhoja) ने इस मन्दिर को संभवतः अपने स्वर्गवासी पिता सिन्धुराज या ताऊ वाकपति मुंज हेतु बनवाया होगा।

भोजपुर के शिव मंदिर का सम्बन्ध महाभारत से है

मंदिर का सम्बन्ध महाभारत (Mahabharat) से भी जुड़ा हुआ है। जनकथा के अनुसार वनवास के समय इस शिव मंदिर को पांडवों ने बनवाया था। भीम घुटनों के बल पर बैठकर इस शिवलिंग पर फूल चढाते थे। इस मंदिर का निर्माण द्वापर युग में पांडवों (Pandavas) द्वारा माता कुंती की पूजा के लिए इस शिवलिंग का निर्माण एक ही रात में किया गया था। जैसे ही सुबह हुई तो पांडव लुप्त हो गए और मन्दिर अधूरा ही रह गया। इसके साथ ही इस मंदिर के पास ही बेतवा नदी है। जहां पर कुंती द्वारा कर्ण को छोड़ने की जनकथाएं भी प्रचलित हैं।

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