
Photo Credits: Twitter
Udaipur: मेवाड़ में कई राजाओं ने शासन किया है। जिसमें से हमने महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) के बारे में अपनी किताबों में खूब पढ़ा है। उनकी महानता और उनके युद्ध कौशल के बारे में हम बहुत अच्छे से परिचित है। किे किस तरह से उन्होंने अपने युद्ध कौशल से मुगलों के दॉंत खट्टे किये थे। लेकिन आज हम जिस महान राजा के बारे में बताने जा रहे है।
वह मेवाड़ के ऐसे शासक थे, जो कि महाराणा कुंभा (Maharana Kumbha) के बाद सबसे प्रसिद्ध शासक थे। इन्होंने अपने युद्ध कौशल और कुशल रणनीति से मेवाड़ साम्राज्य (Mewar Empire) का विस्तार किया और राजपूताना शासकों (Rajpurana Kings) को हमेशा जोड़ कर रखा।
यह वहीं राजा है, जिन्होंने 1527 में खानवा के युद्ध (Khanwa Battle 1527) में मुगलों को हरा दिया था। उन्होंने अपने जीवन में कभी भी मुगलों को जीतने नहीं दिया। हम बात कर रहे है, मेवाड़ के शक्तिशाली शासक राणा सांगा (Rana Sanga) कि जिन्हें महाराणा संग्राम सिंह के नाम से भी जाना जाता है। महाराणा सांगा उदयपुर में सिसोदिया राजपूत राजवंध के राजा थे।
महाराणा सांगा का प्रारंभिक जीवन
महाराणा सांगा का जन्म 12 अप्रैल सन् 1482 को मेवाड़ के चित्तोड (Chittor) में राणा रायमल के घर हुआ था। राणा रायमल महाराणा सांगा के पिता जी थे। महाराणा सांगा उनके सबसे छोटे पुत्र थे। राणा रायमल के 4 पुत्र थे कुंवर पृथ्वीराज, जगमाल, संसां और राणा सांगा। इसके साथ ही इनकी 2 पुत्रिया भी थी।
सांगो धरम सहाय, बाबर सु भिडीयो बहस ;
अकबर पगमां आय, पडे न राण प्रतापसी. (११)जैसे महाराणा प्रताप के पितामह राणा सांगा ने धर्म की रक्षार्थ बाबर से टक्कर ली ठीक वैसे ही महाराणा प्रताप ने कभी अकबर की चरण वंदना नहीं की।#MaharanaPratap#महाराणा_प्रताप_जयंती #स्वाभिमान_दिवस pic.twitter.com/C7HNPpZ1my
— मानवेन्द्र सिंह चुवा (@RathoreMANSA_9) May 9, 2022
एक व्यक्ति, जो कि भविष्य देखते थे, उन्होंने राणा सांगा को भविष्य में मेवाड़ का राजा बताया था। जिस वजह से राणा सांगा के भाई पृथ्वीराज और जगमाल उन्हें मारना चाहते थे। उन्हें मारने के लिए उनके भाई पृथ्वीराज ने धनुष मारा, जिस वजह से राणा सांगा कि एक आँख घायल हो गई। लेकिन किसी तरह से खुद को बचा कर राणा सांगा अजमेर भाग जाते है।
फिर बाद में कर्मचन्द पंवार की सहायता से महाराजा रायमल कि मृत्यू के बाद 1509 में मेवाड़ के महाराजा बन जाते है। राणा सांगा ने 1509 से 1528 तक मेवाड़ पर शासन किया उन्होंने दिल्ली, गुजरात और मालवा में मुगलों के आक्रमण से अपने राज्य की रखा की और सभी राजपूतों को एक जुट किया।
वीर राणा सांगा
राणा सांगा अदम्य साहसी थे। इन्होंने सुलतान मोहम्मद शासक माण्डु को युद्ध में हराने व बन्दी बनाने के बाद उन्हें उनका राज्य पुनः उदारता के साथ सौंप दिया था। यह उनकी बहादुरी को दर्शाता है। बचपन से लगाकर मृत्यु तक इनका जीवन युद्धों में बीता।
Fierce warrior Rana Sanga had fought around 100 battles he defeated Ibrahim lodhi on two occasions and lost an eye, an arm, his leg and had over 80 wounds on his body but still continued to rule and fight for the honor of his land.
Did our history books glorified this warrior ? pic.twitter.com/Mf6ifkVXm7
— Desi Thug (@desi_thug1) January 21, 2021
इतिहास में वर्णित है, कि महाराणा संग्राम सिंह की तलवार का वजन 20 किलो था। जब महाराणा सांगा मेवाड़ की राज गद्दी पर बैठे तो उन्होंने पाया कि उनका मेवाड़ चारों तरफ से शत्रुओं से घिरा हुआ है। महाराणा सांगा ने अपना पूरा शासनकाल युद्ध करने में बिता दिया। धौलपुर, खतौली, मांडू, गुजरात, मालवा इन सब से महाराणा सांगा के छोटे मोटे युद्ध होते ही रहते थे।
मेवाड़ के महाराणा संग्रामसिंह (राणा सांगा) द्वारा जारी किया गया सिक्का…. pic.twitter.com/r5utry3ILe
— RAJPUTANA INDIA NEWS (@Shaktiparwan) May 7, 2022
ऐसा कहा जाता है, कि महाराणा सांगा ने अपने जीवनकाल में लगभग सौ से ज़्यादा लड़ाइयां लड़ी थी। जिसमें उन्होंने अपनी एक आंख, एक हाथ और एक पैर तक गवाँ दिया था। राजस्थान का इतिहास लिखने वाले प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने महाराणा सांगा को सैनिकों का भग्नावशेष कहा है। इसका मतलब यह होता है कि एक सैनिक जिसके शरीर पर अस्सी से भी ज्यादा घाव हैं, लेकिन उसकी बहादुरी में कभी भी किसी भी तरह की कोई कमी नहीं आई। महाराणा सांगा एक बहादुर और महान यौद्धा थे।
किस तरह शुरूआत हुई खानवा के युद्ध कि
इब्राहिम लोदी राणा सांगा से युद्ध तो नहीं कर पाया, क्योंकि उसे पता था कि अगर उसने तीसरी बार संग्राम सिंह के साथ युद्ध किया और वह अगर तीसरी बार भी हार गया, तो भारत में उसकी छवि हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।
तो अपनी हार का बदला लेने के लिए दौलत खान लोदी ने काबुल के बाबर को भारत बुलाया। लेकिन यहां भारत आते ही बाबर और इब्राहिम लोदी के बीच पानीपत की प्रथम ऐतिहासिक लड़ाई हुई, जिसमें इब्राहिम लोदी हार गया और इस तरह दिल्ली पर मुगल सल्तनत की शुरुआत हो गई। लेकिन संग्राम सिंह के जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई उन्होंने बाबर के खिलाफ खानवा के युद्ध में लड़ी। अब आइए जानते हैं खानवा के युद्ध के बारे में।
खानवा का युद्ध
बाबर सम्पूर्ण भारत को रौंदना चाहता था जबकि राणा सांगा एक हिन्दू राज्य की स्थापना करना चाहता थे, परिणामस्वरूप दोनों सेनाओं के बीच 17 मार्च, 1527 ई. को खानवा में युद्ध आरम्भ हुआ। इस युद्ध में राणा सांगा का साथ महमूद लोदी दे रहे थे।
युद्ध में राणा के संयुक्त मोर्चे की खबर से बाबर के सौनिकों का मनोबल गिरने लगा। खानवा के युद्ध में भी पानीपत युद्ध की रणनीति का उपयोग करते हुए बाबर ने सांगा के विरुद्ध सफलता प्राप्त की।
खानवा के युद्ध मे राणा सांगा के चेहरे पर एक तीर आकर लगा, जिससे राणा मूर्छित हो गए, परिस्थिति को समझते हुए उनके किसी विश्वास पात्र ने उन्हें मूर्छित अवस्था मे रण से दूर भिजवा दिया एवं खुद उनका मुकुट पहनकर युद्ध किया, युद्ध मे उसे भी वीरगति मिली एवं राणा की सेना भी युद्ध हार गई। युद्ध जीतने की बाद बाबर ने मेवाड़ी सेना के कटे सरो की मीनार बनवाई थी।
राणा सांगा का अंतिम सफर
जब राणा सांगा को होश आया और बाद में यह बात पता चली कि बाबर कि विजय हुई है, तो वो बहुत क्रोधित हुए, उन्होंने कहा मैं हारकर चित्तोड़ वापस नही जाऊंगा। उन्होंने अपनी बची-कुची सेना को एकत्रित किया और फिर से आक्रमण करने की योजना बनाने लगे।
महाराणा सांगा : मानव इतिहास के सबसे विलक्षण योद्धा जिन्हें जीवन व संगी साथियों के छल के कारण भयंकर दुख उठाने पड़े ।
जानिए इनकी शौर्यगाथा व खानवा के युद्ध का सत्य ।
Buy the book at https://t.co/7DwfkhX90h.#Maharanas pic.twitter.com/LfegvIBHkP
— Dr Omendra Ratnu (@satyanveshan) May 11, 2022
इसी बीच उनके किसी विश्वास पात्र ने उनके भोजन में विष मिला दिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। 1927 को 47 वर्ष कि उम्र में राणा सांगा कि मृत्यू हो गई। उनकी मृत्यू के बाद उनकी रानियॉं सती हो गई थी।
राणा सांगा का विधि विधान से अन्तिम संस्कार माण्डलगढ (भीलवाड़ा) में किया गया। इतिहासकारों से मिली जानकारी के मुताबिक उनके दाह संस्कार स्थल पर एक छतरी बनाई गई थी। ऐसा भी कहा जाता है कि वे मांडलगढ़ इलाके में मुगल सेना पर गरजे थे।



