सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के बारे में रोचक तथ्य, आज इतिहास के पन्नो पर उनका नाम शुमार रहेगा।

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अयोध्या विवादित जमीन को लेकर फैसला आने के बाद रंजन गोगोई का नाम मशहूर हो गया। वो अपने नाम से नही काम से याद किये जाएगे।
रंजन गोगोई ने अयोध्या Case, राफेल डील, चीफ जस्टिस के Office को RTI के दायरे में लाने, सबरीमाला मंदिर से जुड़े ऐतिहासिक निर्णय किए, जिन्हें इतिहास के पन्नों पर याद रखा जाएगा।

साल 2018 में तीन अन्य वरिष्ठ जजों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करके न्यायिक सुधारों का बिगुल बजाने वाले न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने विनम्र प्रेस नोट के माध्यम से, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस Post से विदाई ली।

सुप्रीम कोर्ट में इसके पहले 45 अन्य चीफ जस्टिस पद पर रहे हैं, लेकिन जो काम रंजन गोगोई ने किया वो कोई जज नही कर पाया, अपने निर्णय से भारत के साथ न्यायिक व्यवस्था पर अपनी अदभुत छवि बनाई है। रंजन गोगोई की राजनीति में कोई रुचि नही थी। वो राजनीति में नही जाना चाहते थे। जबकि रंजन गोगोई के पिता असम के सीएम थे।

कानून मंत्री ने जब एक बार गोगोइ के पिता से सवाल किया कि रंजन गोगोई राजनीति में अपना कदम कब रखेंगे। इस बात जा जवाब देते हुए गोगोई के पिता ने कहा कि मेरा बेटा राजनीति में कभी कदम नही रखेगा। उसका राजनीति से कोई लगाव नही है वह एक दिन भारत का सबसे यादगार चीफ जस्टिस बनेगा।

अयोध्या विवादित मुद्दा दो सदी से प्रशासन और कोर्ट के इर्द गिर्द घूम रहा था। कागज पन्नों को लेकर तो कभी अनुवाद के नाम पर सुप्रीम कोर्ट की अदालत में यह मुद्दा 10 सालो से अटका पड़ा था। चीफ जस्टिस पद पर नियुक्त होने के बाद गोगोई ने 5 जजों की बेंच का गठन करवाया। न्यायिक सुनवाई आरंभ करने के पहले उन्होंने सभी समुदाय के लोगो को मध्यस्थता के माध्यम से परेशानी का समाधान करने का अवसर दिया।

40 दिन की सुनवाई खत्म होने के बाद उन्होंने बड़ी विनम्रता के साथ 15 दिन में राम मंदिर के हित में सर्वसम्मति से ऐतिहासिक निर्णय सुना दिया। कुछ दिन पहले दिल्ली में एक समारोह में शामिल होने पहुचे रंजन गोगोई ने अपनी बात रखते हुए बताया कि एकता और खुशहाली बढ़ने के लिए मुकदमेबाजी को समाप्त किया जा सकता है।

अयोध्या मुद्दे में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय के बाद देश में एकता और शांति बनाये रखने की जागरूकता देखी जा सकती है। सभी ने खुले दिल से फैसले का स्वागत किया है। 10 साल पहले अयोध्या मुद्दे को लेकर कोई फैसला नजर ही नही आ रहा था।

अयोध्या मामला दो शताब्दी से प्रशासन और कोर्ट के इर्दगिर्द घूम रहा था। हर बार किसी न किसी बात को लेकर सुनवाई में अटकले आ जाती थी। कभी कोई कागज पन्नों को लेकर तो कभी सही गवाह नजे होने के कारण सुप्रीम कोर्ट में यह मामला 10 सालो से चक्कर काट रहा था। चीफ जस्टिस की नियुक्ति के बाद रंजन गोगोई ने 5 जजों की बेंच का गठन करवाया।

जिसके बाद गोगोइ ने 40 दिन में मामले की सुनवाई समाप्त कर 15 दिन में राम मंदिर के हित में सभी की सर्वसम्मति से ऐतिहासिक निर्णय सुना दिया। अयोध्या निर्णय में सभी जजों की सर्वसम्मति से न्यायमूर्ति गोगोई की Team Leadership और प्रशासनिक दृणता नजर आई।

राष्ट्रपति कोविंद ने मांग की थी कि अयोध्या फैसला हिंदी से लेकर सभी भाषाओं में किया जाना चाहिए इस बात को ध्यान में रखते सुप्रीम कोर्ट जे फैसले को हिंदी से लेकर अन्य भाषाओं में अनुवाद करवाने की राष्ट्रीय पहल की। उसी परंपरा में सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रकाशित “कोर्ट्स ऑफ इंडिया: पास्ट टू प्रेजेंट” किताब के असमिया संस्करण का विमोचन गुवाहाटी में किया गया। इस मौके पर सुप्रीम कोर्ट के भावी चीफ जस्टिस बोबडे ने अपनी बात रखते हुए कहा की रंजन गोगोई के साथ काम करने का मौका पाने को वो अपना सौभाग्य समझते हैं।

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