एक दूध बेचने वाले की 5 बेटियों के किया कमाल, 2 बेटी अफसर बनी और तीसरी समाज के लिए प्रेरणा

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daughter success story
Milk seller's 5 daughter became successful. daughters of a milk seller became an example 2 became officers and the third in the role of guru.

Jehanabad: कहीं सुना होगा “म्हारी छोरी छोरों से कम है के”, दोस्तों यह डायलॉग है तो एक फिल्म का लेकिन साक्षात जीवन में सफल होता दिख रहा है क्योंकि आज हम आपको जिस खबर से परिचित कराने वाले हैं। उसमें एक साधारण से पशुपालन कर दूध बेचने वाले (Milk Seller) महावीर (Mahavir) ने पांच बेटियां होते हुए भी हिम्मत नहीं हारी, बल्कि बचपन से ही ऐसा माहौल बनाया की बेटियां दुनिया में मिसाल कायम कर सकें।

आज की कहानी उस पिता के लिए भी है जिनकी बेटियां हैं और उन बेटियों के लिए भी प्रेरणा है, जिनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं है। उसके बावजूद लगातार मेहनत एवं संघर्ष के साथ सही दिशा में चलती रहें, तो वह भी सफल हो सकती हैं।

खुद पशुपालन कर दूध बेच बेच कर सीमित संसाधनों में पढ़ाया अपनी बच्चियों को

जानकारी के अनुसार यह खबर है जहानाबाद के अंतर्गत आने वाले एक छोटे से गांव बिगहा से जहां महावीर यादव जिन्हें गांव वाले हिलखोरी नाम से जानते हैं। उनकी 6 पुत्रियां एवं 1 पुत्र है, जैसा हम सब जानते हैं बेटियों का होना समाज में एक बोझ की तरह माना जाता है, परंतु महावीर जी की सोच इसके बिल्कुल उलट थी।

उन्होंने हमेशा से यही बोला कि मैं अपनी बेटियों को आगे बढ़ने के लिए जितना संभव हो सकेगा सुविधाएं जुटा लूंगा एवं लायक बनने में पूरी मदद करूंगा। चूंकि दूध बेचकर कमाई सीमित थी, संसाधन सीमित थे, परंतु उनकी दृढ़ संकल्पिता ने बेटियों को आगे बढ़ाया और बेटियों ने भी सीमित संसाधनों के बावजूद मेहनत जारी रखी जो सफल हुई, उन पांचों बेटियों के नाम आपको बताना चाहेंगे आभा निशा सविता अनुपमा एवं स्वीटी है।

दो बेटियां पढ़ीं नवोदय विद्यालय में जिन से मिली छोटी बहनों को प्रेरणा

आपको बता दें की उच्च शिक्षा के नाम पर महावीर जी की सिर्फ दो बेटियां निशा एवं सविता ने अपनी मेहनत से जेठियांन नवोदय विद्यालय में प्रवेश पाने में सफलता प्राप्त की जहां से उन्होंने अपनी 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की।

लेकिन बाकी की बहनों ने अपनी बड़ी बहनों की इस सफलता से प्रेरणा ली एवं गांव से करीब 5 किलोमीटर दूर एक सरकारी स्कूल से ही अपनी शिक्षा पूरी की। बाद में सरकारी नौकरी की तैयारियां भी गांव में ही रहकर की और सफलता पाई।

पिता ने बचपन से ही है एक परमानेंट शिक्षक को घर पर रखा हुआ था बेहतर शिक्षा हेतु

ज्यादा पढ़े लिखे न होने के बावजूद भी शायद महावीर यादव (Mahavir Yadav) जानते थे, की सफलता के लिए बड़ी स्कूल या कॉलेज से ज्यादा जरूरी एक उचित माहौल है। जिससे बच्चे के ब्रेन का सही विकास हो इसी के करके उन्होंने अपने घर में ही शुरू से एक परमानेंट टीचर रखा हुआ था, जो उनकी सभी बच्चियों को बारी-बारी से समय अनुसार ट्यूशन के तौर में पढ़ाया करता था।

पढ़ाई में कोई व्यवधान ना हो, इसके लिए घर से सटके ही एक छोटा सा कमरा बना रखा था, जो सिर्फ पढ़ाई के लिए इस्तेमाल किया जाता था। शायद यही वजह है कि यह बच्चियां को शुरू से आगे बढ़ने का माहौल मिला और आज अपने गांव घर से निकल के यह मुकाम हासिल कर पाए। महावीर जी के इस फैसले ने सबकी लाइफ बदली।

आज ये बेटियां बोझ नहीं बल्कि परिवार की मुखिया बनकर उभर रही

महावीर जी की सबसे बड़ी बेटी आभा एक सरकारी शिक्षक के तौर पर अपनी सेवाएं दे रही हैं, वही दूसरी बेटी निशा बैंक पीओ के रूप में छपरा शहर में पदस्थ हैं, साथ ही तीसरी बेटी सरिता तो इनकम टैक्स की अधिकारी के तौर पर दिल्ली में कार्य कर रही है और विवाह भी कर चुकीं।

अब इनकी राह पर चलते हुए दोनों छोटी बेटियां जोकि स्वीटी एवं अनुपमा है, वह अपना पोस्ट ग्रेजुएशन करने के पश्चात सिविल सर्विसेज में सिलेक्शन हेतु पढ़ाई कर रही हैं और इनके जज्बे को देखते हुए लगता है कि जल्द ही हम इनकी सफलता की कहानी भी आप तक पहुंचाएंगे।

वही दोस्तों महावीर जी का सबसे छोटा बेटा बहनों की तरह सफलता हासिल करते हुए एक प्रोडक्ट इंस्पेक्टर के तौर पर कार्यरत है। इस कहानी से एक बात निकल कर सामने आई है कि यदि किसी परिवार को कम संसाधनों में भी आगे बढ़ना है, तो सही समय पर सफलता का सही माहौल बना कर चलना होगा, जिससे दिमाग का पॉजिटिव डेवलपमेंट हो, क्योंकि कहां गया है जैसा आप सोचते हैं वैसा बन जाते हैं।

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