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Shimla: आपदा में जब लॉकडाउन देश में लगाया गया, उस समय लोगों का जमा जमाया काम छूट गया था। लोगों के जीवन की लाइन पटरी से उतर गई थी। जिस वजह से लोग अपने घर, कस्बे अपने गॉंव वापस लौट कर आ गये थे।
शहरों में काम की तलाश मे गया बहुत बड़ा वर्ग आपदा में अपने घर लौट गया था। लेकिन उन सभी को यह नहीं मालूम था कि वह आगे कि जिंदगी किस तरह बिताएगा। वह अपने परिवार की जरूरत कैसे पूरी करेगा। कैसे उनका पेट भरेगा। कब जिंदगी पहले की तरह होगी। इसका ज्ञान लोगों को नहीं था।
आपदा में प्रवासी मजदूरों ने गॉव में उगाया सरसों
हालांकि अब हमारी जिंदगी सही पटरी में आ चुकी है। गॉंव ओर कस्बे में शहर से लौटे व्यक्ति ने यही पर रहकर काम करना शुरू कर दिया। जिससे उनके जीवन मे उम्मीद की किरण जाग गई। आज की हमारी कहानी भी कुछ ऐसे लोगों की है। जिन्होने आपदा में घर आकर ऐसा कार्य किया कि अब वह शहर जाने के बारे में सोचना तक बंद कर चुके है।
आज की हमारी कहानी असम (Assam) राज्य के कुछ प्रवासी मजदूरों की है। जिन्होंने अपने गॉंव में 100 एकड़ की बंजर पड़ी जमीन में सरसों उगा कर उसे हरा भरा कर दिया। देखने में यह सरसों के खेत नहीं बल्कि, सरसों के जंगल लगते है। सरसों के खेत उगा कर यह मजदूर अब लाखों कि कमाई करते है।
असम के मजदूरों ने 100 एकड़ बंजर पुश्तैनी जमीन पर की खेती
आपको बता दे कि आपदा में जब हर व्यक्ति अपने घर बापस आया था। उस समय असम राज्य के 20 प्रवासी मजदूर भी अपने घर वापस लौट कर आये थे। परन्तु कुछ ही समय में इनके घर की हालत इस प्रकार हो गई कि इन्हें काम की तालाश फिर से करने पड़ी।
उसी समय इन मजदूरों ने ऐसा काम करने का सोचा, जिससे आज इनकी पूरी जिंदगी ही बदल गई। इन मजदूरों ने 30 और अन्य लोगो के साथ मिलकर मौजुली द्वीप में 100 एकड़ की बंजर पड़ी जमीन पर मेहनत करके उसे हरा भरा बना दिया।
आपको बता दे कि यह जमीन बम्हपुत्र नदी (Brahmaputra River) के तट पर स्थित है। इन मजदूरो ने जिस जमीन पर खेती की वह उनके पूर्वजों की जमीन थी। स्थानीय लोग वर्षों पुरानी जमीन पर फिर से फसल को देखकर काफी खुश हुए।
कटाई के बाद पत्येक किसान को होगा 1 लाख का मुनाफा
आपको बता दे कि जिन मजदूरों ने यह खेती की है और जिन लोगो के साथ मिलकर यह फसल उगाई है। वह सब 12वी पास है। यह सभी काम की तालाश मे असम से बाहर गये थे। लेकिन जब लॉकडाउन लगा तो हर प्रवासी मजदूर की तरह यह लोग भी अपने घर आने को मजबूर हुए।
जब वह लोग यहॉ रहने लगे तो लॉकडाउन के बाद उनका मन बाहर जाने का नहीं किया। फिर इन्होंने गॉंव में ही रहकर अपना कुछ अलग कार्य करने का मन बनाया। तभी कुछ और लोग भी उनको साथ मिल गये। सब ने मिलकर फैसला लिया कि वह पुश्तैनी जमीन पर खेती करेंगे।
4 महीने की कड़ी मेहनत करके वह इस मेहनत को सफलता मे बदलने में कामयाब रहे। केरल राज्य के कोट्टायम में कार्य करने के लिए गये दीपांकर कुटुम (Dipankar Kutum) की नौकरी लॉकडाउन में चली गई थी। अपने घर आकर वह काम को लेकर काफी चिंतित थे। उसी समय गॉव के लोगो ने उन्हें खेती करने की सलाह दी और उनकी सलाह काम कर गई।
उत्तराखंड राज्य मे भी एक व्यक्ति ने की थी हल्दी की खेती
कुछ ऐसी ही कहानी असम राज्य से निकलकर आई थी। उत्तराखंड (Uttrakhad) राज्य में भी एक व्यक्ति ने लॉकडाउन में घर आकर हल्दी की खेती शुरू की और उसका काम इतना अच्छा चला कि उन्हे शहर जाने का मन नहीं किया ओर वह अपने गॉवं में ही बस गया।

दीपांकर (Dipankar) का काम भी अब इतना अच्छा चल रहा है कि वह शहर लौटकर नहीं जाना चाहते। ऐसा इसलिए क्योंकि वह केरल में जितना पेसे कमा पाते थे। उससे कही ज्यादा पैसा वह अब अपने गॉव में कमा लेते है।
दस दस हजार रूपये के इन्वेस्टमेंट से किया था काम शुरू
आपको बता दे प्रवासी मजदूरो ने केवल 10 हजार रूपये के कम इन्वेस्टमेंट में यह बिजनेस किया है। सभी मजदूरों ने 10-10 हजार रूपये जमा करके 5 लाख रूपये इकट्ठा किये। फिर उसके बाद सितम्बर में अपना खेती (Mustard Farming) का काम शुरू किया। आज रिजल्ट हमारे सामने है, आज वह सभी लाखों में पैसे कमा रहे है।
आपदा मे जहॉ बहुत से लोगो का कामकाज छूटा वहीं अपने घर से बहुत से लोगो ने नये कार्य को भी प्रारंभ किया। कुछ लोागों ने अपना हुनर निखारा तो वही कुछ लोग छोटा मोटा काम करके अपने गॉंव में ही बस गये। अब यह सभी लोग शायद कभी भी शहर वापस लौट कर नहीं जाएंगे। क्योंकि अपने घर में अपने गॉंव में अपनों के बीच यह सभी बहुत खुश है।



