जनरल शाह नवाज़ ख़ान, जिसने पहली बार लाल किले पर ब्रिटिश झंडा उतारकर, तिरंगा फेहरा दिया था

0
1276
Shah Nawaz Khan
The Untold Story of a INA Hero Shah Nawaz Khan. He was the first to hoist the Indian tricolor in Red Fort by throwing the British flag.

File Photo Credits: Twitter

Delhi: हमारे देश को ब्रिटिश सरकार की गुलामी से आजाद कराने और देश को स्‍वतंत्रता दिलाने में हमारे देश के हजारों वीर सपूतों ने अपनी जान देश के लिए कुर्बान कर दी। उन देश के वीर सपूतों को आज भी जब हम याद करते है, तो हमारी ऑंखे नम हो जाती है।

चाहे बात भगत सिंह की हो, चंद्रशेखर आजाद की हो, या फिर रामप्रसाद विस्‍मिल की। सभी ने हमारे देश की आजादी में अपना महत्‍वपूर्ण योगदान दिया है और वह सब आज भी हमारे दिल में जीवित है। सभी वीर सपूत देश के लिए अपनी जान तक गवाने में पीछे नहीं हटे।

वही देश को आजादी दिलाने में कई ऐसे महान क्रातिकारियों है, जिन्‍होंने हर तरीके से सिर्फ भारत देश कि आजादी के लिए अपना तन मन धन न्‍यौ्छावर कर दिया। आज हम उन्‍हीं में से एक ऐसे वीर देश भक्‍त के बारे में बताने जा रहे है। जोकि आजाद हिंद फौज के मेजर जनरल थे और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बहुत ही पसंदीदा थे। हम उनकी बात कर रहे है, जिन्‍होंने लाल किले पर ब्रिटिश का झण्‍डा (British Flag) उतार कर भारत के तिरंगे (Indian Tricolor) को फहराने कि शुरूआत कि थी।

शाहनवाज खान (Shah Nawaz Khan) की शुरूआती जिंदगी

हम बात कर रहे है शाहनवाज खान जी कि जोकि एक निडर और साहसी सैनिक हेाने के साथ ही एक समाजसेवी और कुशल राजनीतिज्ञ भी थे। शाहनवाज खान जिनका जन्‍म 24 जनवरी 1914 को रावलपिंडी में हुआ था। रावलपिंडी जो कि अब पाकिस्‍तान का हिस्‍सा है। वहा के झंझुआ राजपूत कैप्टन सरदार टीका खान जी के घर में हुआ था।

शाहनवाज कि शुरूआती पढाई पाकिस्‍तान के रावलपिंडी (Rawalpindi) में ही हुई थी। सन् 1940 में वह एक अधिकारी के तौर पर ब्रिटिश सेना (British Army) में शामिल हो गये थे। वह जिस समय ब्रिटिश सेना में शामिल हुये थे, उस समय दुनिया में युद्ध चल रहा था। जो द्वि‍तीय विश्‍व युद्ध था। जिसके चलते ब्रिटिश सेना ने उन्‍हें सिंगापुर में पदस्थ कर दिया था और उसी समय जापान कि सेना ने कई ब्रिटिश सेनिकों को अपनी गिरफ्त में ले लिया था।

देश को आजादी दिलाने के लिए 1943 में नेता जी सुभाष चंद्र बोस (Nehaji Subhas Chandra Bose) सिंगापुर आ गये थे और फिर उन्‍होंने आजाद हिंद फौज के सहारे सभी सैनिकों को जापानी सेना के बंधनों से मुक्‍त कराया था। इसी समय उन्‍होंने यह नारा ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ बोला था। जिससे शाहनवाज जी इतना प्रभावित हुए कि नेता जी कि फौज में जुड़ गये और अंग्रेजो से देश को आजाद कराने के सफर में शामिल हो गये।

वीर सैनिक के तौर पर उनका सफर

शाहनवाज खान जी के देश के प्रति अपार प्रेम को और एक लीडर कि क्षमता देख कर सुभाष चंद्र बोस ने उन्‍हे हुकूमत-ए-आजाद हिंद की कैबिनेट में जोड़ लिया था। सुभाष चंद्र बोस ने सितंबर 1945 में आजाद हिंद फौज के कुछ बाहदुर सैनिकों को चुनकर सुभाष ब्रिगेड बनायी थी।

इस ब्रिगेड कि जिम्‍मेदारी उन्‍होंने शाहनवाज को दी थी। इस ब्रिगेड ने ही नागालैण्‍ड के कोहिमा में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोला था। और फिर बाद में शाहनवाज जी को संयुक्त सेना सेकेंड डिविजन के कंमाडर बनकर बर्मा भेजा गया था।

1945 में बर्मा में शाहनवाज को युद्ध के चलते बंदी बना लिया था। उसके बाद दिल्‍ली के लाल किले (Red Fort Delhi) में बिटिश सरकार ने नवंबर 1946 में शाहनवाज खान, प्रेम सहगल और गुरुबक्श सिंह के ऊपर राजद्रोह का केस चलाया गया। लेकिन जनता के प्रेशर और उनके सपोर्ट कि बजह से बिटिश सरकार को उन्‍हें छोड़ना पड़ा था। उस समय इनकी पैरवी सर कैलाश नाथ कटजू, बुलाभाई देसाई, तेज बहादुर सप्रू, जवाहर लाल नेहरु, आसफ अली ने की थी।

1946 में इंडियान नेशनल कांग्रेस में हुए थे शामिल

1946 के बाद शाहनवाज खान जी जवाहर लाल नेहरू और महात्‍मा गाांधी जी से प्रभावित होकर इंडियन नेशनल कांग्रेस में शामिल हो गये। शहनवाज खान जी को 1947 में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू (PM Jawaharlal Nehru) ने कांग्रेस सेवा दल (Congress Sewa Dal) के सभी सदस्यों को देश के वीर जवानों कि तरह प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी उठाने को कहा था। शाहनवाज खान जी कांग्रेस सेवा दल के सेनापति पद से सम्‍मानित किया गया था और इस पद को उन्‍होंने 1947 से 1951 तक संभाला था।

राजनीति का सफर

देश के आजादी के बाद उन्‍होंने राजनीति कि और रूख किया और 1952 में उन्‍होंने अपना पहला लोकसभा चुनाव कांग्रेस की टिकट पर मेरठ से लड़ा और उसमें जीत भी अपने नाम की। इस सफर को आगे बढ़ाते हुये उन्‍होने सन् 1957, 1962 और 1971 में भी मेरठ से लोकसभा चुनाव में जीत हासिल क

जानकारी के मुताबिक आपको बात दे कि 1952 में चुनाव जीतने के बाद शाहनवाज जी संसद सेक्रेटरी और डिप्टी रेलवे मिनिस्टर के पद पर रहे। और उसके बाद 1957 से 1964 तक वह केन्द्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्री के पद में कार्यरत रहे।

उसके बाद 1965 में कृषि मंत्री बनाए गये और 1966 में श्रम, रोजगार एवं पुर्नवास मंत्रालय के मंत्री बने। इसके अलावा उनका राजनीतिक सफर और भी लंबा रहा सन् 1971 से लेकर 1975 तक वह पेट्रोलियम रसायन और कृषि तथा सिंचाई विभाग के मंत्री बने।

उसके बाद अंत में उनहोंने 1975 से 1977 के समय केन्द्रीय कृषि एवं सिंचाई मंत्री के एफसीआई के चेयरमैन का पद संभाला। 1945 में नेताजी कि जान जाने की वजह का कारण जनाने के लिए जॉंच का गठन किया। इस गठन में 1956 में जो कमीशन बनाया गया था उसके अध्‍यक्ष शाहनवाज जी ही थे। .

शाहनवाज खान को ‘खान’ कि पदवी जवाहरलाल नेहरू जी ने दी थी। शाहनवाज जी के पौते उनके बारे मे कुछ किस्‍से बताते हुए कहते है कि एक बार की बात है कि एक रेलवे का कर्मचारी बिना छुट्टी लिये कही चला गया था। जिस वजह से उसे उसके पद से निकाल दिया गया था।

इस बात कि जानकारी जब शाहनवाज जी को लगी तो शाहनवाज जी ने कैबिनेट मंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी से इसे बारे में वार्तालाप कि लेकिन उस समय शास्‍त्री जी ने इस बात पर उतना विचारविमर्श नहीं दिया जिस वजह से शाहनवाज जी ने इस्‍तीफा दे दिया था। जब शास्त्री जी ने उनसे इसका कारण पूछा तो शाहनवाज जी बोले कि अगर में अवाम के लिए कोई काम करने लायक नहीं हूं, तो इस कुर्सी पर बैठने का मुझे हक नहीं है।

लाल किले पर फहराया था झण्‍डा

हमारा देश जब बिट्रिश सरकार से स्‍वतंत्र हुआ था। उस समय ब्रिटिश हुकूमत का झंडा लाल किेले से उतारकर उसकी जगह भारत का तिरंगा फहराने वाले जनरल शाहनवाज जी ही थे। जानकारी के मुताबिक आपको बात दे, कि लालकिले में जो रोज शाम छह बजे लाइट एंड साउंड का कार्यक्रम होता है। उस कार्यक्रम में नेताजी के साथ जनरल शाहनवाज की ही आवाज है।

भारत रत्‍न देने के लिए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने शहनवाज जी के लिए मॉंग की थी। हमारे देश के डाक विभाग के द्वारा महान स्वतंत्रा सेनानी जनरल शाहनवाज खान और उनके साथ कर्नल प्रेम चंद और साथ ही कर्नल गुरुबख्शक कि फोटो के साथ डाक टिकट भी जारी कर चुका है।

शाहनवाज खान 9 दिसंबर 1983 को हमारे देश को अलविदा कह कर चले गये। राजीव गांधी जी ने उनकी गाजियाबाद में शवयात्रा की अगुआई की थी। आपको बता दे, शाहनवाज जी को लालकिले के पास ही जामा मस्जिद के पास पूरे सम्मान के साथ दफनाया गया।

आपको बता दे, किे जनरल शाहनवाज खान जी के परिवार में उनके तीन पुत्र महमूद नवाज, अकबर नवाज, अजमल नवाज और तीन पुत्रियां मुमताज, फहमिदा और लतीफ फातिमा हैं। जिसमें से लतीफ फातिमा को उन्होंने गोद लिया था।

आपको बता दे शाहनवाज फांउडेशन को उनके पोते आदिल शाहनवाज ही चलाते है। शहनवाज जी सिर्फ एक कुशल सैनिक ही नहीं थे। बल्‍कि वह एक वीर स्‍वतंत्रता सैनानी इसके साथ ही कुशल राजनेता और एक सच्‍चे राष्‍ट्रभक्‍त भी थे। उन्‍होंने देश की आजादी के लिए जो भी किया वह अतुलनीय है और वह इतिहास के पन्‍नों में हमेशा के लिए अमर हो चुके है। हमारे देश का हर नागरिक उनके इस योगदान के लिए हमेशा उन्‍हें याद करता रहेगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here