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Raipur: बस्तर (Baster) का नाम दिमाग में आते ही लोगों के दिलो में नक्सलवाद से ग्रस्त क्षेत्र का ख्याल आने लगता है, लेकिन वर्तमान में छत्तीसगढ़ (Chattisgarh) का जनजीवन बदल रहा है। वहां के नवयुवक नये नये रोजगार को जन्म दे रहे हैं। ऐसा नया काम और सुसज्जित कार्य कर रही हैं, बस्तर की रजिया शेख।
रजिया महुआ (Mahua) फल के लड्डू का निर्माण कर वहां के लोगों तक पहुंचा रही हैं। जिसकी वजह से वहां की आदिवासी महिलाओं को रोजगार प्राप्त हो रहा है, साथ ही उनके द्वारा कुपोषण को समाप्त करने के लिये एक पहल की शुरुआत हुई है।
इस कार्य के लिए रजिया का चयन नीति आयोग के तहत तस्वीर को बदलने वाली 30 महिलाओं में हुआ है। वर्तमान समय में 14 महिलाएं इस कार्य के साथ जुड़ी हुई है और भारत में ही नहीं, अपितु विदेश में भी महुआ के पुष्पपाण्ड् से निर्मित मोदक (Laddu) का निर्यात कर रही हैं।
क्या है महुआ और इसके गुण
महुआ छत्तीसगढ़, विशेष प्रकार से बस्तर के ग्रामीण अंचल का सांस्कृतिक एवं आर्थिक मूल्य है। यह न केवल खाने के रूप में नही अपितु पेय के रुप में भी प्रयोग में लाया जाता है और इसे विक्रय करके नकद धन कमाया जाता है।
Mahua Flowers. U can make wine or Healthy Laddu as well. pic.twitter.com/lNdt5ONsrh
— Ek Number News (@EkNumberNews) March 27, 2022
वैसे तो महुआ फल से बनने वाली दारू पूरे बस्तर अंचल में प्रसिद्ध है। लेकिन, अब इससे लड्डू का निर्माण हो रहा है। महुआ फूल में प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट की मात्रा पाई जाती है। इससे निर्मित लड्डू (Laddu) बच्चों में कुपोषण और महिलाओं में खून की मात्रा को दूर करती है, यह रोगों से लड़ने में सहायक है। कहा जाता है कि यह गर्भवती महिलाओं को स्वस्थ रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कैसे आया महुआ लड्डू का विचार
ऐसे आया महुआ से लड्डू निर्माण करने का तरीका। जगदलपुर में निवास करने वाली रजिया शेख (Razia Shaikh) ने माइक्रोबायोलॉजी से MSC पूर्ण किया है। रजिया गवर्नमेंट में रिसर्च का कार्य करती थी। रजिया बताती हैं कि काम के दौरान उनको अंदरूनी क्षेत्रों में प्रयोग के लिए जाना पड़ता था। अनेक प्रकार के पेड़ पौधों का अध्ययन करती थी।
बस्तर की रज़िया महुआ से पौष्टिक लड्डू बनाती है। भारत सहित विदेशों से भी डिमांड आने लगी। pic.twitter.com/nOFC6Qnt5Y
— sanatanpath (@sanatanpath) March 27, 2022
एक बार की बात है, फील्ड अध्ययन के दौरान मैंने वहां की आदिवासी महिलाओं को महुआ के मोदक बनाते हुए स्वयं देखा और इन महिलाओं के साथ आपस में वार्तालाप करके मैंने और इसको अच्छे से जानने की कोशिश की तभी मेरे मस्तिष्क में एक विचार आया कि क्यों ना इसे ग्रामीण अंचल से बाहर निकाल कर एक अच्छा प्लेटफार्म दिया जाए।
आसान नहीं थी यह डगर
प्रारंभ में रजिया को कई सारी मुश्किलों से गुजरना पड़ा। इन लड्डू के फ़ायदे तो पता था, लेकिन इनको और मिठास स्वादिष्ट बनाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। बहुत प्रयोग करने के बाद उनकी टीम ने इसे टेस्टी और हेल्दी बनाने का हल निकाला। बिना किसी केमिकल का उपयोग करके कैसे इसे बस्तर के बाहर पैकेट प्रोजेक्ट के रूप में बाहर निकाला जाए। इसके लिये कार्य करना प्रारंभ कर दिया।
शुरू में हुई आलोचनाएं
प्रारंभ में इसे कोई नहीं खरीदना चाहता था। क्योंकि सभी लोग महुआ को एक दारू के रूप में जानते थे। इसलिए शुरुआत में बहुत से लोगों ने इसे मना कर दिया। लोगों ने इसके बारे में बहुत कुछ बुरा भला कहा कि यह कैसा व्यवसाय है, नहीं चलेगा, लेकिन राजिया ने भी हिम्मत नहीं हारी सफलतापूर्वक अपने वादे के अनुरूप आगे बढ़ती गई।
उनका ऐसा जुनून था कि मैं इसको हर हाल में करके रहूंगी। उन्होंने शुरुआत में इसकी कीमत 5 Ru रखी। प्रारंभ में लोग प्रयोग के तौर पर इसको धीरे-धीरे खरीदने लगे। रजिया ने एक कंसलटेंसी फर्म की स्थापना कर प्रतिदिन नए-नए प्रयोग करके इसको और बेहतर बनाया और साथ साथ में ही इसका प्रशिक्षण भी शुरू किया और वर्तमान समय में रजिया के साथ एक मजबूत टीम तैयार हो गई।



