
Photo Credits: TOI Video Crap Image
Dehradun: यह कहानी आपको एक ऐसी प्रेरणा देगी, जो आपको संघर्ष करने के लिए जोश भर देगी। हमारे देश में लाखों स्टूडेंट्स और अभ्यर्थी सरकारी नौकरी पाने के लिए एग्जाम और इंटरव्यू देते हैं। ऐसे में कुछ ही लोगो में सफलता हासिल हो पाती है और अनेक लोग निराश होकर बैठ जाते हैं। परन्तु क्या हो, जब आप किसी एग्जाम में टॉप करे और इसके बाद भी आपको नौकरी ना हासिल हो सकें।
आपको मध्यप्रदेश का व्यापम घोटाला तो याद होगा ही और MBBS इंट्रेंस एग्जाम का स्कैम तो गजब ही था। कितने काबिल अभ्यर्थी नौकरी पाने से वंचित रह गए थे। आज की कहानी में हम आपको एक मेरिट टोपर का नौकरी पाने का संघर्ष बता रहे हैं। उसने कभी हार नहीं मानी और सरकार को भी झुका दिया।
अखबार के विज्ञापन को देखकर आवेदन किया
यह बात है साल 1989 की, जब 24 वर्षीय गेराल्ड जॉन (Gerald John) ने अखबार के विज्ञापन को देखकर देहरादून (Dehradun) के सरकारी सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान CNI बॉयज इंटर कॉलेज (CNI Boys Inter College) में वाणिज्य शिक्षक (Teacher) के पद के लिए आवेदन किया था। उन्होंने इसके लिए लगन से तैयारी भी की थी।
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इंटरव्यू क्लियर करने और मेरिट लिस्ट में टॉप (Top) करने के बावजूद उन्हें वह नौकरी नहीं दी गई थी। जब उनसे पूछा गया कि उन्हें नौकरी क्यों नहीं मिली, तो उन्होंने बताया गया कि उम्मीदवार के पास स्टेनोग्राफी की भी योग्यता होना चाहिए, जोकि उनके पास नहीं थी।
स्टेनोग्राफी आने के बारे में भी नहीं बताया गया
गेराल्ड जॉन ने बताया की नौकरी (Job) की आवश्यकता में आशुलिपि का उल्लेख नहीं किया गया था। जॉब के विज्ञापन में स्टेनोग्राफी आने के बारे में भी नहीं बताया गया था। इसको आधार बनाकर साल 1990 में फर्रुखाबाद निवासी जॉन इलाहाबाद हाईकोर्ट चले गए।
साल 2000 में उत्तराखंड के उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद मामला नैनीताल में एचसी को ट्रांसफर कर दिया गया। अब याचिकाकर्ता गेराल्ड जॉन 55 साल हो गए है, तब उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दिसंबर 2020 में उनके पक्ष में फैसला सुनाया हैं। मतलब नौकरी के लिए आवेदन 1989 को किया गया था और फिर इसका फैसला 2020 को आया।
अब आये अदालत के फैसले ने उन्हें स्कूल में नियुक्त करने के साथ-साथ मुआवजे के रूप में 80 लाख रुपए (80 Lakh Ru) जारी करने का आदेश दिया है। TOI की जानकारी के मुताबिक उत्तराखंड सरकार (Uttarakhand Government) ने जॉन को कुछ महीने पहले ही 73 लाख रुपए का भुगतान किया था। बाकी बचे 7 लाख रुपए का भुगतान उत्तर प्रदेश सरकार (Uttar Pradesh Govt) द्वारा किया जाना बाकी बताया गया।
https://twitter.com/sanatanpath/status/1470664533093933057
अब जॉन उस स्कूल में सबसे वरिष्ठ शिक्षक हैं, इसलिए वे शिक्षण संस्थान (Minority Educational Institute in Dehradun) के कार्यवाहक प्राचार्य भी बन गए हैं। उन्होंने हार नहीं मानी और अपने हक़ की लड़ाई जीती और सफलता हासिल की। जॉन की यह कहानी और संघर्ष (Struggle Story) आपको प्रेरणा देने के लिए काफी है। आप भी प्रयास करना और अपने हक़ के लिए खड़े होना ना छोड़ें।




