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Lucknow: वैसे तो काबिलियत और टैलेंट किसी की मोहताज़ नहीं होती है, परन्तु कभी कभी आर्थिक तंगी और गरीबी के चलते दब जाया करती है। फिर भी अगर किसी समझदार और जानकार व्यक्ति की नज़र पढ़ जाये, तो वह काबिलियत की कदर करते हुए मदत कोह हाँथ बढ़ा ही देता है। हालाँकि किसी ने ठीक ही कहा है की काबिल लोगो की मदत करने खुद भगवान् अपने फ़रिश्ते भेज दिया करते हैं।
इस बार खुद फरिश्ता बनकर खुद उत्तर प्रदेश के लखनऊ में हाईकोर्ट बेंच (Lucknow High Court Bench) के जज दिनेश कुमार सिंह (Justice Denesh Kumar Singh) आये हैं। लखनऊ में हाईकोर्ट बेंच के जज दिनेश कुमार सिंह ने एक शानदार मिसाल पेश की है। यह मामा प्रकाश में आने के बाद से जज साहब की हर तरफ तारीफ हो रही है।
एक छात्रा के पास बीएचयू आईआईटी में एडमिशन के लिए पैसे नहीं थे। ऐसे में जज दिनेश कुमार ने इस मामले की सुनवाई भी की और उन्होंने तत्काल अपनी जेब से 15 हजार रुपये भी दिए। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, एक मेधावी छात्रा संस्कृति रंजन ने लखनऊ की हाईकोर्ट बेंच में याचिका दायर की थी।
इस याचिका में कहा गया था कि आईआईटी बीएचयू (IIT BHU) में एडमिशन फीस भरने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे और तय समय पर फीस नहीं भर पाने के चलते वह अपना एडमिशन नहीं (Do Not Got Admition) ले पाई। यह बहुत दुःर्भाग्य पूर्ण है।
छात्रा ने अपनी दायर याचिका में कहा कि उसने जॉइंट सीट एलोकेशन अथॉरिटी को कई बार पत्र लिखकर पैसे न होने की बात बताई थी, लेकिन अथॉरिटी ने कोई भी रिप्लाई नहीं दिया। यह अथॉरिटी का गैरज़िम्मेदाराना रवैया उस स्टूडेंट को एडमिशन से वंचित कह गया। इस पर सुनवाई करते हुए जज दिनेश कुमार सिंह ने छात्रा की पढ़ाई का रिकॉर्ड भी चेक किया।
जज साहब ने पाया की छात्रा के 10वीं में 95.6%, 12वीं में 94% मार्क्स हासिल किये थे। छात्रा के पिता ने कहा कि उसके पिता की किडनी खराब हो गई है और उनका किडनी ट्रांसप्लांट भी होना है। बेतिया के फीस के पैसे भी नहीं है। ऐसे में जज ने आदेश देते हुए कहा कि तीन दिन में उसे एडमिशन दिया जाए। इसके अलावा मिलार्ड ने खुद अपनी जेब से भी 15000 रुपये फीस के लिए दिए।
उन्होंने IIT-BHU को छात्रा के प्रवेश के लिए आदेश दिया है। कोर्ट का कहना है कि यदि अभी के समय में सीट खाली नहीं हैं, तो भी छात्रा के लिए अलग से व्यवस्था की जाए। छात्रा ने जेईई मेन्स परीक्षा (JEE Mains Exam) में 92.77% के साथ एससी केटेगरी 2062 रैंक हासिल की थी और जेईई एडवांस (JEE Advance) में 1469 रैंक लेकर आई है।
कोर्ट ने ज्वाइंट सीट अलॉकेशन अथॉरिटी और IIT-BHU को भी निर्देश दिया कि छात्रा को तीन दिन के अंदर दाखिला दिया जाए। एडमिशन पर उसका पूरा हक़ है। पैसे की कमी के चलते उसे एडमिशन से वंचित रखना सही नहीं है। बता दें की याचिकाकार्य छात्रा का कहना था कि वह इतनी गरीब है कि अपने लिए एक वकील का भी इंतजाम नहीं कर सकी थी।
हाईकोर्ट के कहने पर एडवोकेट सर्वेश दुबे और समता राव ने छात्रा का पक्ष रखने में कोर्ट का सहयोग किया। छात्रा ने फीस की व्यवस्था करने के लिए कुछ और समय की मांग की थी। इस पर छात्रा को जस्टिस दिनेश कुमार सिंह ने 15 हजार रुपए फीस दी।
छात्रा संस्कृति रंजन (Sanskrati Ranjan) ने याचिका में कहा कि उसके पिता की किडनी खराब है। उनका किडनी ट्रांसप्लांट होना है। अभी सप्ताह में दो बार डायलिसिस होती है। ऐसे में पिता की बीमारी के चलते परिवार की आर्थिक स्थिति खबर हो गई है। इस कारण वह समय पर फीस नही जमा कर सकी थी। अब कोर्ट के आदेश और जज साहब की मदत से छात्रा को सुहूलियत मिल गई है।





