हिंदुस्तान की शान ‘तिरंगा’ बनाने वाले ‘पिंगली वैंकया’ के त्याग और बलिदान की अनोखी कहानी

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पिछले कुछ वर्षों से देसभक्ति की नई लहर आई हुई है। हर मीडिया में देशभक्ति को लेकर बहस छिड़ जाती है। देशभक्ति पर लोगों का बहस मुद्दा प्रतिदिन सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर दिखाई देता है। इन सब बातों से हटकर एक बात है कि भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा को किसने बनाया उसका निर्माता कौन था? ये सब बात एक सवाल ही है।

उस महान शख्स का नाम पिंगली वेंकैया जिसने भारत का राष्ट्रीय ध्वज को तैयार करने में अपना सब कुछ समर्पित कर दिया था। हिंदुस्तान की शान और हमारी पहचान तिंरगा, जिसको देखते ही हम सम्मान के साथ गर्व महसूस करते है। 2 अगस्त को हिंदुस्तान की शान तिंरगा को बनाने वाले पिंगली वैंकया की जयंती है। स्वत्रंत्रता से पहले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अलग-अलग अवसरों पर भिन्न-भिन्न झंडों का इस्तेमाल करते थे।

1921 में आंध्र प्रदेश के रहने वाले पिंगली वेंकैया ने अखिल भारतीय Congress कार्य समिति के बेजवाड़ा सत्र में महात्मा गांधी के सामने हिंदुस्तान का राष्ट्रीय ध्वज लाल और हरे रंग का झंडे के रूप में प्रस्तुत किया। भारत को तिरंगा देने वाले पिंगली वेंकैया का जन्म 2 अगस्त 1876 को आंध्र प्रदेश में हुआ था। उन्होंने अपनी शुरुआत की पढ़ाई मद्रास से की।

मद्रास से हाई स्कूल पास करने के बाद वो अपने वरिष्ठ ग्रेजुएशन को पूरा करने के लिए कैंब्रिज यूनिवर्सिटी चले गये। पिंगली कई विषयों के प्रसिद्ध ज्ञाता थे। कैंब्रिज से वापिस आने के बाद उन्होंने एक रेलवे गार्ड के रूप में नोकरी की। फिर लखनऊ में एक सरकारी कर्मचारी के रूप में कार्य किया। बाद में वह एंग्लो वैदिक विश्वविद्यालय में उर्दू और जापानी लेन्वेज को सीखने लाहौर चले गए।

लाहौर से वापिस आने के बाद वह महात्मा गांधी से प्रभावित होकर राष्ट्रीय Congress में शामिल जो गए। काकीनाड़ा में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय Congress के राष्ट्रीय अधिवेशन के समय पिंगली वेंकैया ने हिंदुस्तान का खुद का राष्ट्रीय ध्वज होने की आवश्यकता पर जोर दिया और उनकी यह विचारधारा महात्मा गांधी जी को बहुत पसन्द आई। महात्मा गांधी जी ने उन्हें राष्ट्रीय ध्वज का प्रारूप बनाने का सुझाव दिया।

पिंगली वैंकया ने 5 सालों तक 30 विभिन्न देशों के राष्ट्रीय ध्वजों पर अपना शोध किया और आखिरी में तिरंगे के लिए विचार किया। 1921 में विजयवाड़ा में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय Congress के अधिवेशन में वैंकया पिंगली महात्मा गांधी से मिले थे और उन्हें अपने द्वारा तैयार किया हुआ लाल और हरे रंग से बनाया हुआ झंडा दिखाया।

इसके बाद ही देश में Congress पार्टी के सारे अवसरों में दो रंगों वाले झंडे का इस्तेमाल किया जाने लगा लेकिन उस टाइम इस झंडे को Congress की तरफ से अधिकारिक तौर पर स्वीकार नहीं किया गया था। इस दौरान जालंधर के हंसराज ने झंडे में चक्र चिन्ह बनाने का अपना सुझाव दिया। इस चक्र को प्रगति और आम नागरिक के प्रतीक के रूप में समझा गया।

बाद में महात्मा गांधी जी के सुझाव पर पिंगली वेंकैया ने शांति के प्रतीक सफेद रंग को भी राष्ट्रीय ध्वज में जोड़ दिया। 1931 में Congress ने कराची के अखिल भारतीय सम्मेलन में केसरिया, सफ़ेद और हरे तीन रंगों से बने इस ध्वज को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया। बाद में समय के चलते इस राष्ट्रीय ध्वज में तिरंगे के बीच चरखे का स्थान अशोक चक्र ने ले लिया।

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