
Ahmedabad: रूढ़िवादी कुछ लोग अभी भी बेटियां को बोझ समझते है, उनको कहना होता है कि बेटियां एक बेटे की जगह नहीं ले सकती हैं, एक बेटी घर की जिम्मेदारी नहीं संभाल सकती। आज हम आपको एक ऐसी बेटी की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसने ये सोच को तोड़ बेटियों को उड़ने के लिए पंख दिये है, इस कथन को सच साबित कर दिया, हमारी छोरी छोरों से कम नही है।
जीवन संघर्षों (Struggle) से भरा हुआ है। जीवन में चुनौतियों और कठिनाईयों का डटकर सामना करने वाले हमेशा ही लोगों के सामने प्रेरणा बनकर उभरते हैं। ऐसी ही स्टोरी है, गुजरात (Gujarat) की अंकिता की। इन्होने अपनी कठिन परिस्थियों के बावजूद भी ईमानदारी से काम करने को अहमियत दी।
कौन है दिव्यांग ऑटो महिला
अंकिता (Ankita Shah) को बचपन में ही पोलियो ने अपनी चपेट में ले लिया था। जिसके बाद उनके दाहिने पैर ने काम करना बंद कर दिया था। जो दिव्यांग होने के बाद भी ऑटो रिक्शा (Auto Rickshaw) चलाकर परिवार का पेट भर रही हैं। उनके माता-पिता ने अंकिता के होसलो को कभी कम नही होने दिया हमेशा उनको आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहिता किया और उनकी पढ़ाई पूरी करने में हेल्प की।
परिवार ने बढ़ाया होसला
अंकिता जब एक साल की थी, तब उसके दाहिने पैर में पोलियो हो गया। उसे इस बात की मन मे तशली है कि इतनी दिक्कत परेशानियों के बीच भी माता-पिता ने उसका साथ दिया और पढ़ाई पूरी करने के लिए उनके होसलो को मजबूत क़िया। हर परिस्थिति में उनके साथ परछाई बनकर खड़े रहे। उसने ईकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन किया।
2009 में काम की खोज करते करते गुजरात से अहमदाबाद आ गईं। अंकिता ने बताया कि यहां कई जगह इंटरव्यू दिए, लेकिन निराश ही हाथ लगी। कुछ कंपनी में उन्हें ये कहकर बाहर कर दिया कि उनके दिव्यांग होने के कारण से कंपनी का नाम खराब होगा। अंकिता के परिवार में सात व्यक्ति है जिनकी जिम्मेदारी उन्ही के सर पर है।
किस्मत ने नही दिया साथ
किस्मत भी कभी कभी ऐसे दोराहे पर खड़ी कर देती है, जंहा से कोई रास्ता समझ नही आता। कई लोग परिस्थिति से हार कर खुद को मिटा देते है। लेकिन कई लोग ऐसे होते है जो हर परिस्थिति का डटकर मुकाबला करते है। हर असफलता से सिख लेकर आगे बढ़ते है। असफलता से कभी निराष नही होना। सफलता का रास्ता कठिन जरूर है, लेकिन नामुमकिन नही।
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अंकिता के साथ भी कुछ ऐसा हि हुआ कठिनाई रुकने का नाम ही नही ले रही थी। 2019 में अंकिता के पिता को कैंसर हो गया। तब उसने काम के लिए यहां-वहां भटकने के बजाय खुद अपना काम शुरू करने का निर्णय किया। ये कितना सफल होगा या नही ये नही पता था लेकिन मजबूत हौसलों से आगे कदम बढ़ा लिया।
दोस्त ने सिखाया ऑटो चलाना
उसने अपने एक ऑटो ड्राइवर (Auto Driver) दोस्त लालजी बरोत से ऑटो चलाने की ट्रेनिंग ली। लालजी बरोत स्वंय भी दिव्यांग हैं। उन्होंने कस्टमाइज्ड ऑटो रिक्शा खरीदने में भी अंकिता की हेल्प की। अंकिता ऑटो चलाने के लिए रोज सुबह 10:30 बजे घर से निकल जाती हैं और रात को 8:30 बजे घर पहुंचती हैं।
इस तरह ऑटो ड्राइविंग से उन्हें 25000 रुपए महीने की कमाई होने लगी। अंकिता चाहती हैं कि उनकी कहानी (Story) हर उस दिव्यांग महिला के लिए प्रेरणा बने, जो अपनी लाचारी को देखकर उसी का रोना रोती रहती है। मजबूत हौसलों के साथ खड़े होकर खुद को सावित करके दिखाओ।



