आज भी अफ़ग़ानिस्तान में जब बच्चा रोता है, तो माँ कहती है चुप हो जा, वरना हरीया आ जायेगा

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Hari Singh Nalwa Story
Hari Singh Nalwa was the most feared Sikh warrior from India. Hari Singh Nalwa The Sikh Commander Who Made India Safe From Afghanistan.

Presentation Photo

Delhi/Peshawar/Kabul: अफगानिस्तान (Afghanistan) को को फराह करना आसान नहीं है और आज तक 2 लोगो के अलावा कोई और अफ़ग़ान की धरती को जीत नहीं पाया है। यह दोनों ही अफ़ग़ान विजेता भारतीय राजा रहे हैं। अफगानिस्तान (Afghanistan) को यू ही साम्राज्यों का कब्रिस्तान कहे जाने वाले पर पूरी नहीं कहा जाता है। सोवियत संघ और अमेरिका जैसी बड़ी शक्तियों को 20-20 साल जंग लड़कर घर वापसी करनी पड़ी है।

ऐसे में इतिहास में 2 नाम है, जिन्होंने अफगानिस्तान के बड़े हिस्से को जीतकर भारत की सीमा में मिलाया था। एक तो चन्द्रगुप्त मौर्या थे और फिर दूसरा सिख साम्राज्य (Sikh Empire) थ। सिख साम्राज्य के सबसे बड़े सिख योद्धा नाम हरि सिंह नलवा (Hari Singh Nalwa) को कहा जाता है। उस वक़्त इनके नाम से अफगानिस्तान के बड़े-बड़े सरदार और योद्धा भी डरते थे। साल 2013 में भारत सरकार ने हरि सिंह नलवा के सम्मान में स्टांप भी जारी किया था।

सिख साम्राज्य की सेना के सबसे भरोसेमंद सेनापति

हरि सिंह नलवा (Hari Singh Nalwa) सिख साम्राज्य के महाराजा रणजीत सिंह (Maharaja Ranjit Singh) की सेना के सबसे बहादुर और भरोसेमंद सेनापति अर्थात कमांडर (Commander-in-chief of the Sikh Khalsa Army) थे। वे कश्मीर, हजारा और पेशावर के गवर्नर के पद पर भी आसीन रहे। हरि सिंह नलवा ने अनेक अफगान सरदारों और कबीलों को हराया और अफगानिस्तान की सीमा समेत कई इलाकों पर कब्ज़ा बनाया था। रणजीत सिंह पंजाब के सिख साम्राज्य के संस्थापक और महाराजा (1801-39) थे।

नलवा ने खैबर पास (Khyber Pass) के जरिए अफगानों को पंजाब में घुसने से रोका। 19वीं सदी की शुरुआत तक विदेशी आक्रमणकर्ताओं के भारत में घुसने का मुख्य रास्ता खैबर पास ही था। यहीं से गज़नी और गौरी भी आया करते थे। अतः इस रास्ते को कब्ज़ा करके सुरक्षित करना बेहाज़ जरुरी था।

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सिख जानकर बताते है की अफगानिस्तान को ऐसा क्षेत्र कहा जाता था, जिसे कोई जीत नहीं सका था और हरि सिंह नलवा ही थे, इसे जीतने में सफल रहे थे, जिन्होंने अफगानिस्तान की सीमा और खैबर पास (Khyber Pass Today in Pakistan) पर नियंत्रण के करके अफगानों को खदेड़ा और उत्तर-पश्चिम सीमा को नुकसान पहुंचाने से रोका था।

अफगान माताएं कहती, बेटा चुप हो जा, वरना नलवा आ जायेगा

हरि सिंह नलवा ने अफगानों के खिलाफ काफी जंग लड़ी, जिनमें अफगानों को कई इलाकों पर अपना कब्ज़ा गवाना पड़ा। इनमे सन 1807 में कसूर, 1813 में अटक, 1818 में पेशावर और 1837 में जमरूद पर कब्ज़ा हासिल किया था। जानकारों बताते हैं कि उनकी नालवा की मृत्यु जमरूद की जंग में हो गई थी।

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अफगानों के खिलाफ ऐसी जीतों के चलते ही अफगानों में नलवा का भय समा गया था। इसके चलते ही माताएं भी परेशान करते और रोते छोटे बच्चों को शांत करवाने के लिए कहती थी की “बेटा चुप हो जा, वरना हरीया आ जायेगा, यह अभी तक ज़ारी है। हरी सिंह नालवा को उस वक़्त अफ़ग़ान क लोग भूत और शैतान भी कहा करते थे।

जमरूद की जंग में वे घायल होने के बाद अपने प्राण गवा बैठे

यदि महाराजा रणजीत सिंह और उनके कमांडर हरि सिंह नलवा पेशावर और उत्तर-पश्चिमी सीमा क्षेत्र नहीं कब्ज़ा करते, तो यह इलाका अफगानिस्तान का हो सकता था और पंजाब और दिल्ली में अफगानों के आक्रमण कभी नहीं रुकते। जमरूद की जंग में वे गंभीर रूप से घायल होने के बाद अपने प्राण गवा बैठे थे।

कहा जाता है की मृत्यु से पहले उन्होंने अपनी सेना को उनके निधन की खबर तब तक देने से मना किया था, जब तक अन्न सैनिक बल उनका समर्थन देने के लिए लाहौर न पहुंच जाएं। कहा जाता है कि सिख सेना ने युद्ध के दौरान उनके शरीर को इस तरह से उठा कर रखा था कि दुश्मनों को ऐसा प्रतीत हो की हरी सिंह नालवा भी मैदान के जंग में खड़े है।

नलवा ने अफगानिस्तान के हज़ारों सनिकों को हराया

हरि सिंह नलवा ने अफगानिस्तान की एक जनजाति हज़ारा के हज़ारों सनिकों को हराया, जबकि हरि सिंह की ताकत हज़ारा के तीन गुना से भी कम थी। 1807 कसूर की जंग (अभी पाकिस्तान) में हरि सिंह नलवा ने अफगानी शासक कुतुब-उद-दीन खान (Kutab-ud-din Khan) को हराया था। फिर अटक की जंग (1813) में नलवा ने अजीम खान और उसके भाई दोस्त मोहम्मद खान के हो हराया, जो काबुल के शाह महमूद की तरफ से लड़े थे और यह दुर्रानी पठानों पर सिखों की पहली बड़ी जीत थी।

उसके बाद साल 1818 की पेशावर की जंग में नलवा की सिख सेना ने पेशावर को जीता और यहाँ के गवर्नर बनकर बैठे। साल 1837 में नलवा ने ज़मरूद को भी जीता, जो खैबर दर्रे के ज़रिये अफगानिस्तान का भारत में के प्रवेश द्वार पर एक किला था।

अगर यह हिस्सा उस वक़्त नालवा ने नहीं जीता होता तो आज यह क्षेत्र अब वर्तमान पाकिस्तान का हिस्सा नहीं होता, बल्कि अफगानिस्तान का हिस्सा हो सकता था। ऐसे में पाकिस्तान के लोगो और पाक सरकार को हरी सिंह नालवा का सम्मान करना चाहिए। इसके उलट पाक में कुछ दिनों पहले लाहौर किले में लगी महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति को तोड़ दिया गया था।

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