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Delhi: यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जो की विदेश में एक फ्रोफेसर थे और फिर बाद में वापस भारत आकर किसान के रूप में काम करके लाखो कमाने लगे और आज दूसरों के लिए प्रेरणा बन गए हैं। माथचन सऊदी अरब के ढरान में किंग फ़हद यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेट्रोलियम एंड मिनरल्स में दूरसंचार विभाग में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत थे, इसी दौरान उन्हें अरामको ऑयल कंपनी की ओर से एक अंग्रेजी अनुवादक के रूप में चीन जाने का मौका मिला। इस विषय में माथचन बताते है कि अपनी चीन यात्रा के दौरान, मैं वूशी स्थित दंशुई मत्स्य अनुसंधान केंद्र (Matsya Anusandhan kendra) गया।
माथचन ने एक अख़बार हो बताया की मत्स्य पालन (Matsya Palan) एक ऐसा क्षेत्र था, जिसमें मेरी हमेशा रुचि रही थी। इसलिए मैंने उनके कई पाठ्यक्रमों के बारे में जानकारियां इकठ्ठी करनी शुरू की। इसी क्रम में पता चला वे मोती उत्पादन से संबंधित डिप्लोमा कोर्स चला रहे हैं। यह मुझे कुछ नया लगा और मैंने इसमें दाखिला लेने का फैसला किया। माथचन ने कुछ हफ्ते बाद अपनी नौकरी छोड़ दी और डिप्लोमा करने के लिए चीन चले गए। उनका पाठ्यक्रम छह महीने में पूरा हुआ और साल 1999 में उन्होंने अपने तालाब में मोती की खेती करनी शुरू कर दी।
इस बारे में माथचन ने एक अख़बार हो बताया की ‘यह जल्दबाजी में लिया गया फैसला था और कई लोगों ने इसकी आलोचना की, लेकिन मुझे विश्वास था कि यह कारोबार कमाल का साबित होगा और इसे में आगे बढ़ा सकता है।’ इसके बाद माथचन ने महाराष्ट्र और पश्चिमी घाटों से निकलने वाली नदियों से सीपों को लाया और उन्हें अपने घर में, बाल्टियों में उपचारित करने लगे और पहले 18 महीनों की खेती के फलस्वरूप 50 बाल्टी मोती उत्पादित हुआ।
65 वर्षीय केजे माथचन केरल से ताल्लुक रखते हैं। वह अपने आंगन में ही बाल्टी में मोती को उगा रहे हैं और इससे वह लाखों का मुनाफा कमा रहे हैं। वह प्रत्येक वर्ष लगभग 50 बाल्टी से भी ज्यादा मोतियों को उगाते हैं।👍👍🤗 pic.twitter.com/JidXnEaDvQ
— Archana Sharma (@ArchanaVed) December 20, 2020
माथाचन बताते हैं, मैंने शुरुआत में लगभग 1.5 लाख रुपये खर्च किए थे और लगभग 4.5 लाख के मोतियों का उत्पादन (Pearls Farming) हुआ, इस तरह मुझे 3 लाख रुपए का फायदा हुआ। इसके बाद हमारा कारोबार निरंतर आगे बढ़ रहा है और मैंने उन लोगों के लिए कक्षाएं लेने का लाइसेंस भी प्राप्त कर लिया है, जो मोती की खेती सीखना चाहते हैं।
लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन कक्षाएं
कोरोना महामारी के कारण पिछले कुछ महीनों से माथचन का कारोबार काफी मंद पड़ा हुआ है, लेकिन उन्होंने अपनी कक्षाओं को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर ले जाने में सफलता हासिल की और अपने अनूठे बिजनेस आइडिया के कारण काफी ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। इस कड़ी में कोच्चि की आशा जॉन कहती हैं, जब मैंने पहली बार मोती की खेती के बारे में सुना, तो मुझे विश्वास नहीं हो रहा था। लेकिन, जब मैंने उनके फार्म को देखा तो मुझे अहसास हुआ कि यह कितना व्यवहारिक था। फिर, मैंने उनकी कक्षाओं की मदद से प्रक्रियाओं को स्पष्ट रूप से समझा और छोटे पैमाने पर खेती शुरू की।
बी कॉम अंतिम वर्ष में पढ़ने वाली आर्द्रा सहदेवा का भी कुछ ऐसा ही मानना है, वह कहती हैं, 28 दिनों की अवधि के दौरान माथचन सर कच्चा माल कहाँ से मंगाना है से लेकर खेती (Farming) के लिए किन मानकों का इस्तेमाल करना चाहिए, हर छोटी प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताते हैं। इसके लिए उनका धन्यवाद, मेरा लॉकडाउन काफी प्रोडक्टिव रहा है।
गमले में गोभी उगाना तो पुरानी बात हो गयी, केरल के एक शख़्स के.जे. माथचन अपने आँगन में बाल्टीयों में “मोती” उगाते हैं…
वो हर साल लगभग 50 बाल्टी से भी ज़्यादा मोती उगाते और अरब, ऑस्ट्रेलिया, स्विटज़रलैंड जैसे देशों में बेचते हैं! pic.twitter.com/QZvxdFhGxI— Anti-Secular Banda (@AntiSecularGuy) December 19, 2020
इन वर्षों के दौरान, माथचन की खेती ने बहुत लोकप्रियता हासिल की है और यही वजह है कि, केरल (Kerala) के कई विश्वविद्यालयों और यहां तक कि कर्नाटक के मत्स्य विभाग के कई छात्रों ने उनके मोती फार्म (Pearls Farm) का दौरा किया है। उन्होंने कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, बेंगलुरु में इससे संबंधित कई व्याख्यान भी दिए हैं। यदि मैं सऊदी अरब में अपनी नौकरी जारी रखता तो अपने शहर के किसी दूसरे इंसान की तरह ही रहता। मैंने कुछ ऐसा करने की कोशिश की, जो अलग था। उस वक्त भारत में मोती की खेती पर कम बातें हुआ।
कैसे करते हैं मोतियों की खेती
माथचन बताते हैं, मोती (Pearls) मूलतः तीन प्रकार के होते हैं कृत्रिम, प्राकृतिक और संवर्धित। मैं पिछले 21 वर्षों से संवर्धित मोतियों की खेती कर रहा हूँ। इसकी खेती करना आसान है, क्योंकि भारत में ताजे पानी के शम्बुक आसानी से उपलब्ध होते हैं। वह नदियों से लाए गए सीपों को काफी सावधानी से खोलते हैं और इन्हें एक जीवाणु युक्त मेष कंटेनर में 15-25 डिग्री सेल्सियस गर्म पानी में पूरी तरह डुबो देते हैं। डेढ़ वर्षों में नाभिक, मोती के सीप से कैल्शियम कार्बोनेट जमा करके मोती का एक थैली बनाता है।
इस पर कोटिंग की 540 परतें होतीं हैं, तब जाकर एक उत्तम मोती का निर्माण होता है। माथचन के ज्यादातर मोतियों को ऑस्ट्रेलिया, कुवैत, सऊदी अरब और स्विट्जरलैंड निर्यात किया जाता हैं, जहाँ संवर्धित मोतियों की काफी मांग है। माथचन इस विषय में बताते हैं, भारतीय बाजार में अधिकांशतः कृत्रिम मोती उपलब्ध होते हैं और सिंथेटिक कोटिंग के कारण ये असली दिखते हैं। यही कारण है कि ये सस्ते होते हैं। एक असली मोती की कीमत लगभग 360 रुपये कैरेट और 1800 रुपये प्रति ग्राम होती है।
65-YO Mathachan is a #pearl #farmer in Kasaragod, Kerala, who teaches @thebetterindia readers how to cultivate pearls in your backyard. Perhaps a useful #lockdown hobby to cultivate that can boost your #income!#workfromhomelife#JobsDuringCoronahttps://t.co/QjFHDn6zDp
— Anuradha Parekh (@AnuradhaParekh) July 15, 2020
माथचन ने अपने बैकयार्ड में मोतियों के थोक उत्पादन के लिए एक कृत्रिम टैंक भी बनाया है। इसके बारे में यहाँ का दौरा करने वाले एक यूट्यूबर लीटन कुरियन बताते हैं, टैंक की लंबाई लगभग 30 मीटर, चौड़ाई 15 मीटर और गहराई 6 मीटर है। मैंने इतना अनोखा बिजनेस आइडिया कभी नहीं देखा और जिस कोशिश के साथ सेटअप बनाया गया है, वह वास्तव में विवस्निया है।
माथचन अपनी शेष जमीन पर वनीला, नारियल और आम की कई किस्मों की भी खेती करते हैं। फिलहाल माथचन स्थानीय किसानों की मदद से खेती कार्यों का प्रबंधन करने के साथ ही कई रुचि रखने वाले लोगों को मोती उत्पादन का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। आगे बात करते हुए वे बोलते है कि मैंने इसे किया, यह अभी और समृद्ध हो रहा है।



