
Delhi: क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की 115वीं जयंती (Chandra Shekhar Azad 115 Birth Anniversary) है। 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के आजाद नगर तब भाभरा में उनका जन्म हुआ, उनकी स्मृति में शहर का नाम आजाद नगर रखा गया। उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए आज जिले के जनप्रतिनिधि और कई बड़े अधिकारी आजाद की कुटिया पर श्रद्धांजलि अर्पित की। उनसे जुड़ी प्रदर्शनी भी लगाई।
सन् 1922 में गाँधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण उनकी विचारधारा में परिवर्तन आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय मेम्बर बन गये। इस संस्था के माध्यम से राम प्रसाद बिस्मिल (Ram Prasad Bismil) के नेतृत्व में पहले 9 अगस्त 1925 को काकोरी काण्ड किया और फरार हो गये।
इसके पश्चात् सन् 1927 में ‘बिस्मिल’ के साथ 4 प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया तथा भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय के देहांत का बदला सॉण्डर्स को हमेढ के लिए सुलाकर के लिया एवं दिल्ली पहुँच कर असेम्बली ब-म कांड अंजाम दिया।
#ChandrashekharAzadJayanti today's his birth anniversary and #aazad told that no one #british catch me before me dead, #i_am_aazad_and__when_i_died_i_will_aazad, British Empire never caught me. Grand salute you #aazad.@radhika_1113 @MallGarima @SUBHASHyadav441 @A_Jingoist pic.twitter.com/hMdI09u2B2
— 🇮🇳Darsh (@Darsh0020) July 23, 2021
ऐसा भी कहा जाता हैं कि आजाद (Chandra Shekhar Azad) को पहचानने के लिए ब्रिटिश हुक़ूमत ने 700 लोग नौकरी पर रखे हुए थे। चंद्रशेखर को आजाद कहे जाने के पीछे एक खास वजह है। जब 15 साल की उम्र में चंद्रशेखर को जज के सामने पेश किया गया तो उन्होंने ने कहा, मेरा नाम आजाद है, मेरे पिता का नाम स्वतंत्रता और मेरा घर जेल है। जज ये सुनने के बाद भड़क गए और चंद्रशेखर को 15 कोड़ों की सजा सुनाई, यही से उनका नाम आजाद पड़ गया।
सैकड़ों पुलिस वालों से अकेले लड़ते समय हुए वीरगति को प्राप्त
चंद्रशेखर आजाद अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में सुखदेव और अपने एक अन्य और साथी के साथ योजना बना रहे थे। अचानक अंग्रेज पुलिस ने उनपर हम-ला कर दिया। आजाद ने पुलिस पर गो-लियां चलाईं जिससे कि सुखदेव (यह वे सुखदेव नहीं हैं जो भगत सिंह के साथ फां-सी पर चढ़ाए गए थे) वहां से बचकर निकल सके।
Tributing the great Freedom Fighter Chandershekar Azad on his birth anniversary i.e. 23 July 1906.Born in a Brahmin family on July 23, 1906, to Pandit Sitaram Tiwari and Jagrani Devi, he spent his early childhood in the Bhabra village of Madhya Pradesh.#ChandrashekharAzadJayanti pic.twitter.com/PJw8zV0JM7
— Advocate Prashant Pandey (@pinku_pandey_) July 23, 2021
पुलिस की गो-लियों से आजाद बुरी तरह चोटिल हो गए थे। वे सैकड़ों पुलिस वालों के सामने 20 मिनट तक लोहा लेते रहे। उन्होंने संकल्प लिया था कि वे न कभी पकड़े जाएंगे और न ब्रिटिश सरकार उन्हें फां-सी दे सकेगी। इसीलिए अपने संकल्प को पूरा करने के लिए अपनी पि-स्तौल की आखिरी गो-ली खुद को मारली और मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति दे दी।
पैतृक गाँव में चन्द्रशेखर आजाद की मूर्ति
चन्द्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) का जन्म भाबरा गाँव अब चन्द्रशेखर आजादनगर वर्तमान अलीराजपुर जिला में एक ब्राह्मण परिवार में 23 जुलाई सन् 1906 को हुआ था। उनके पूर्वज बदरका वर्तमान उन्नाव जिला बैसवारा से थे। आजाद के पिता पण्डित सीताराम तिवारी संवत् 1963 में अकाल के समय अपने पैतृक निवास बदरका को छोड़कर पहले कुछ दिनों मध्य प्रदेश अलीराजपुर रियासत में नौकरी करते रहे फिर जाकर भाबरा गाँव में बस गये।
how should we stand firm to protect our honor even inodd circumstances? Can't be a better example than Azad. Humble tributes to #ChandraShekharAzad ji on his Birth Anniversary. His life inspire us for the sheer love for the nation #जियो_तिवारी_जनेऊधारी #ChandrashekharAzadJayanti pic.twitter.com/w1LKaknqDw
— Vanya Singh (@VanyaaSingh) July 23, 2021
यहीं बालक चन्द्रशेखर का बचपन बीता। उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था। आजाद का प्रारम्भिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भाबरा गाँव में हुई अतएव बचपन में आजाद ने भील बालकों के साथ खूब धनुष-बाण चलाये। इस प्रकार उन्होंने निशानेबाजी बचपन में ही सीख ली थी। बालक चन्द्रशेखर आज़ाद का मन अब देश को आज़ाद कराने के लिए प्रेरित हो गया।
उस समय बनारस क्रान्तिकारियों (Krantikari) का गढ़ था। वह मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी के सम्पर्क में आये और क्रान्तिकारी दल के मेम्बर बन गये। क्रान्तिकारियों का वह दल “हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। क्रान्तिकारियों के इस दल ने अनेक युवाओं को प्रेरित किया और देश की आज़ादी की ज्वाला उनके मन में भरी।
1919 में हुए अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार ने देश के नवयुवकों को उद्वेलित कर दिया। चन्द्रशेखर उस समय पढाई कर रहे थे। जब गांधीजी ने सन् 1920 में असहयोग आन्दोलनका फरमान जारी किया तो वह आग ज्वालामुखी बनकर फट पड़ी और तमाम अन्य छात्रों की भाँति चन्द्रशेखर भी सडकों पर उतर आये। अपने विद्यालय के स्टूडेंट्स के जत्थे के साथ इस आन्दोलन में हिस्सा लेने पर वे पहली बार गिर-फ़्तार हुए और उन्हें 15 बेतों की सज़ा मिली।
#ChandrashekharAzadJayanti Azad! 🇮🇳
What a charismatic persona!
His call for a revolution echoes even today. My tribute to the great son of Bharata Mata. pic.twitter.com/NjbNmHBPCN— Medhansh (@iam_medhansh) July 23, 2021
ऐसे ही कानून तोड़ने के लिये एक छोटे से लड़के को, जिसकी उम्र 14 या 15 साल की थी और जो अपने को आज़ाद कहता था, बेंत की सजा दी गयी। वह नग्न किया गया और बेंत की टिकटी से बाँध दिया गया। जैसे-जैसे बेंत उस पर पड़ते थे और उसकी चमड़ी उधेड़ डालते थे, वह ‘भारत माता की जय’ चिल्लाता था। हर बेंत के साथ वह लड़का तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक वह बेहोश न हो गया। बाद में वही लड़का उत्तर भारत के क्रान्तिकारी कार्यों के दल का एक बड़ा नेता बना।
झांसी को बनाया अपना गढ़
चंद्रशेखर आजाद ने एक निर्धारित वक्त के लिए झांसी को अपना गढ़ बना लिया। झांसी से पंद्रह किलोमीटर दूर ओरछा के जंगलों में वह अपने साथियों के साथ निशानेबाजी किया करते थे। अचूक निशानेबाज होने के कारण चंद्रशेखर आजाद दूसरे क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के छ्द्म नाम से बच्चों के अध्यापन का कार्य भी करते थे। वह धिमारपुर गांव में अपने इसी छद्म नाम से स्थानीय लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए थे। झांसी में रहते हुए चंद्रशेखर आजाद ने गाड़ी चलानी भी सीख ली थी।
स्वर्गीय लाला लाजपतराय का लिया बदला
17 दिसम्बर, 1928 को चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और राजगुरु ने संध्या के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ़्तर को जा घेरा। ज्यों ही जे पी सांडर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर बैठकर निकला, पहली गो-ली राजगुरु ने चला दी, जो साडंर्स के मस्तक पर लगी और वह मोटर साइकिल से नीचे गिर पड़ा।
भगतसिंह ने आगे बढ़कर चार–छह गो-लियाँ और चलाकर उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया। जब सांडर्स के अंगरक्षक ने पीछा किया, तो चन्द्रशेखर आज़ाद ने अपनी गो-ली से उसे भी समाप्त कर दिया। लाहौर नगर में जगह–जगह परचे चिपका दिए गए कि स्वर्गीय लाला लाजपतराय का बदला ले लिया गया। समस्त भारत में क्रान्तिकारियों के इस क़दम को सराहा गया।



