परमवीर चक्र से सम्मानित सबसे कम उम्र के वीर सैनिक योगेंद्र यादव की बहादुरी को सलाम

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Yogendra Singh Yadav Kargil
Yogendra Singh Yadav, Youngest Param Vir Chakra winner At 19, he was awarded the Param Vir Chakra. The 19-year-old soldier who won India's highest military honour. Story of Yogendra Singh Yadav Kargil Hindi.

Old Photo Credits: Twitter

Bhopal: 4 जुलाई 1999 का दिन भारतीय सेना के लिए गौरव का दिन था। कारगिल जंग (Kargil) के दौरान इसी दिन भारतीय सेना ने टाइगर हिल पर एक बार फिर अपना कब्जा कर लिया था। सेना की टुकड़ी की अगुवाई कर रहे हवलदार योगेंद्र यादव ने 36 घंटे तक चले इस ऑपरेशन में बहादुरी शौर्य का प्रदर्शन किया था। 19 गो-लियां खाने के बाद भी उन्होंने टाइगर हिल पर तिरंगा फहराया था।

सम्मानित लेफ्टीनेंट योगेन्द्र सिंह यादव (Yogendra Singh Yadav) भारतीय सेना अधिकारी हैं, जिन्हें कारगिल जंग के दौरान 4 जुलाई 1999 की कार्रवाई के लिए उच्चतम भारतीय सैन्य सम्मान परमवीर चक्र (Param Vir Chakra) से सम्मानित किया गया। मात्र 19 वर्ष की आयु में परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले ग्रेनेडियर यादव, सबसे कम उम्र के सैनिक हैं जिन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ।

श्री यादव का जन्म 10 मई 1980 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले औरंगाबाद अहिर गांव में हुआ था। उनके पिता करण सिंह यादव ने 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान जंगो में भाग लेकर कुमाऊं रेजिमेंट में सेवा की थी। यादव 16 साल और 5 महीने की उम्र में ही भारतीय सेना में शामिल हो गए थे।

योगेंद्र यादव 18 ग्रेनेडियर्स के साथ कार्यरत कमांडो प्लाटून ‘घा-तक’ का हिस्सा थे, जो 4 जुलाई 1999 के शुरुआती घंटों में टाइगर हिल पर तीन सामरिक बंकरों पर कब्ज़ा करने के लिए नामित की गयी थी। बंकर एक ऊर्ध्वाधर, बर्फ से ढके हुए 1000 फुट ऊंची चट्टान के शीर्ष पर स्थित थे।

यादव स्वेच्छा से चट्टान पर चढ़ गए और भविष्य में आवश्यकता की सम्भावना के चलते रस्सियों को स्थापित किया। आधे रस्ते में एक दुश्मन बंकर ने मशीन गन और रॉकेट फायर खोल दी जिसमे प्लाटून कमांडर और दो अन्य वीरगति को प्राप्त हो गए। अपने गले और कंधे में तीन गो-लियों के लगने के बावजूद, यादव शेष 60 फीट चढ़ गए और शीर्ष पर पहुंचे।

गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वह पहले बंकर में घुस गए और एक ग्रेनेड से चार पाकिस्तानी सैनिकों को हमेशा के लिए सुला दिया। दुश्मन को नस्तानबूत कर दिया, जिससे बाकी प्लाटून को चट्टान पर चढ़ने का मौका मिला। उसके बाद यादव ने अपने दो साथी सैनिकों के साथ दूसरे बंकर पर हम-ला किया और हाथ से हाथ की लड़ाई में चार पाकिस्तानी सैनिकों का अंत कर दिया। अतः प्लाटून टाइगर हिल पर काबिज होने में सफल रही।

आगे एक ज़ोरदार हलचल के साथ कई पाकिस्तानी सैनिकों के ची-थड़े उड़ गए। इस बीच योगेन्द्र ने पास पड़ी राय-फ़ल उठा ली थी और बचे हुए पाकिस्तानी सैनिकों को हमेशा के लिए सुला दिया। पाकिस्तानी सैनिक के पैर यादव को छू गए और उन्हें एक सनसनी महसूस हुई। अत्यधिक पीड़ा में भी इस बहादुर सिपाही को अपने देश की सेवा करने की मजबूती मिली।

एकदम चुपचाप, यादव ने एक हथ-गोला निकाला और उसे पाकिस्तानी सैनिक पर फेंक दिया, जो उससे कुछ ही फीट की दूरी पर था। ग्रेनेड उसके जैकेट के हुड के अंदर उतरा और इससे पहले कि वह पता लगा सके कि क्या हुआ था, उसे उ-ड़ा दिया। तब तक योगेंद्र का बहुत रक्त बह चुका था। इसलिए वो ज़्यादा देर होश में नहीं रह सके।

यादव को 17 गो-लियां लगी, लेकिन एक भी गो-ली उनकी जान नहीं ले पाई। तब गंभीर रूप से जख्मी जमीन पर लेटे, यादव ने पाकिस्तानी सैनिकों की बातचीत सुनते हुए मृ-त होने का नाटक किया। इत्तेफाक़ से वह एक नाले में जा गिरे और बहते हुए नीचे आ गए।

भारतीय सैनिकों ने उन्हें बाहर निकाला और इस तरह से उनकी जान बच सकी, ग्रेनेडियर यादव के लिए परमवीर चक्र देने की घोषणा की गई थी, लेकिन जल्द ही पता चला कि वह अस्पताल में उनकी स्थिति सुधार हैं अब वो खतरे से बाहर है और जीवित हैं।

अगस्त 1999 में, नायब सूबेदार योगेन्द्र सिंह यादव को जंग के दौरान अनुकरणीय साहस प्रदर्शित करने के लिए भारत के सर्वोच्च सैन्य अलंकरण परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। 26 जनवरी 2006 को, यादव ने इस सम्मान के सबसे कम उम्र के प्राप्तकर्ता बनते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन से पुरस्कार प्राप्त किया।

जान की बाजी लगा कर देश की सेवा करने के कारण भारत सरकार द्वारा मर-णोपरांत परमवीर चक्र का सम्मान दिया गया था किन्तु बाद में उनकी जान बचा ली गई। कारगिल पर भारतीय तिरंगा लहराया गया। जंग के बाद योगेंद्र सिंह यादव को अपनी बहादुरी के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। वर्तमान में भी वो भारतीय सेना को अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

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