पिता के जाने के बाद मां ने भेजा अनाथालय, चपरासी बन पढ़ाई की और बदली किस्मत, अब IAS अधिकारी

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IAS Mohammad Ali Shihab
An Awesome story of IAS Mohammad Ali Shihab (2011) will leave you inspired to work harder in any circumstances. From Kerala Orphanage to Cracking UPSC: The Incredible Story of IAS Mohammad Ali Shihab.

Image Credits: Twitter

Delhi: किस्मत बदलते देर नही लगती। जब बदलती है तो चारो खाने अपनी झोली में होते है। अद्भुत व अकल्पनीय सी कहानी है। जिसको पढ़कर आपका मन भावुक हो जायेगा। संघर्ष की दुनिया में कभी कभी ऐसी कहानी सुने मिलती है। जिससे लोगो को बहुत सीख मिलती है।

अमीरी गरीबी नहीं बल्कि आपका जुनून तय करता है, आपकी सफलता की सीढ़ी। हर दिन किसी ना किसी कहानी को सुनते है, हर इंसान की कामयाबी के पीछे उसकी मेहनत ही होती है जो उसे सफलता की ओर ले जाती है। एक ऐसा लड़का जो कभी दाने-दाने को मोहताज हुआ।

उसके सिर पर खुद की घर तक नहीं थी। छोटी सी उम्र में पिता जे चले जाने के बाद दो छोटी बहनों के साथ-साथ खुद को भी अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। आज वो कामयाब इंसान आईएएस अफसर है। नाम है मोहम्मद अली शिहाब।

मुहम्मद ने कठिन परिस्थितियों से लड़कर कामयाबी हासिल की लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जो पहले ही कोशिश में और बेहद कम उम्र में यह अपने लक्ष्य को हासिल कर लेते हैं। इन्हीं कामयाब शख्स में से एक हैं, मोहम्मद अली शिहाब। इन्होंने 2011 के यूपीएससी एग्ज़ाम में 226वीं रैंक हासिल की।

जिन लोगों में प्रतिभा को दिखाने की कमी होती है, अधिकतर वो अपनी किस्मत या अपनी परिस्थितयों को सामने रखकर अपनी सफलता से दूर हो जाते है। हर पल मेहनत करने से पीछे हटते है। हर समय अपनी परिस्थिति को ही रोना रोते रहते है।

सफलता नही मिलने पर किस्मत को कोसते रहते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपनी कठिन परिस्थितयों को देखने की बजाय उसका डटकर सामना करते हैं और कामयाबी की एक नई कहानी लिख जाते हैं। ऐसा ही एक उदाहरण हैं मोहम्मद अली शिहाब।

शिहाब ने बचपन की पढ़ाई अपने घर पर ही कि लेकिन किस्मत ने तब उनका साथ छोड़ दिया जब गरीबी के कारण उनकी विधवा मां पढ़ाई-लिखाई करवाने में असमर्थ हो गई, तो उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई अनाथालय से करने का विचार बनाया। मोहम्मद अली शिहाब की कहानी देश के उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा से भरी है, जो सभी सुख-सुविधाओं के होते हुए भी पढ़ाई करने से पीछे हट जाते हैं।

मोहम्मद अली शिहाब का जन्म केरल के मलप्पुरम जिले के एक गांव, एडवन्नाप्परा में हुआ था। बचपन में शिहाब अपने पिता के साथ पान और बांस की टोकरियों की दुकान में काम किया करते थे। 1991 में लंबी बिमारी के चलते शिहाब के पिता का देहांत हो गया, उस समय शिहाब की उम्र बहुत कम थी।

शिहाब की मां इतनी गरीब थीं कि पिता के देहांत हो जाने के बाद वो अपने पांच बच्चों का खर्च उठाने में असमर्थ हो गई। जिसके चलते उन्हें दिल पर पत्थर रखकर शिहाब सहित अपने सभी बच्चों को अनाथालय में डालना पड़ा।

कोई भी मां नहीं चाहती कि उसके जीते जी वे अपने बच्चों को अनाथयल में छोड़े, वो अपने बच्चों से दूर हो, लेकिन गरीबी ही है, जो कुछ भी करने को मजबूर कर देती है और यही वजह है कि शिहाब और उनके भाई बहनों को अपना बचपन एक मुस्लिम अनाथालय में गुज़ारना पड़ा। शिहाब ने हार नही मानी, अपने होसलो को बनाये रखा, मजबूती से हर परिस्थिति का डटकर सामना किया।

गरीबी के कारण मां अपने बच्चों का पेट तक भरने में भी सक्षम न हो सकी। एक मां अपने बच्चों को कभी खुद से अलग नहीं कर पाती, लेकिन जब वो उन्हें भूख से तड़पता देखती है तब उसे सही गलत कुछ भी समझ नहीं आता। ऐसा ही कुछ शिहाब की मां के साथ हुआ।

दाने दाने को मोहताज शिहाब की गरीब मां ने भूख से हार कर अपने बच्चों को ये सोचते हुए अनाथालय में डाल दिया कि वहां कम से कम उन्हें पेट भर खाना तो मिलेगा। भले ही अनाथालय के बारे में लोग कुछ भी सोचें, लेकिन शिहाब के लिए ये अनाथालय किसी वरदान की तरह साबित हुआ।

यहां उन्हें केवल पेट भरने को भोजन ही नहीं बल्कि वो मंजिल भी मिली, जो उनकी ज़िंदगी बदलने वाला थी। यहां रहते हुए शिहाब का ध्यान पढ़ाई लिखाई कि तरफ ज्यादा हो गया। अच्छी बात ये हुई कि वह अपने पढ़ाई लिखाई में वहां मौजूब अन्य बच्चों से काफी समझदार निकले।

अनाथ बच्चों के साथ रहते हुए शिहाब ने पढ़ाई की, इस अनाथालय में उन्होंने 10 साल गुजारे। शिहाब पढ़ने में पहले से ही और भाई बहनों में ज्यादा तेज थे। इसी वजह के चलते वो सभी के आकर्षण का केंद्र बन गए। शिहाब बताते हैं कि अनाथालय से मिली अनुशासन उनको जीवन व्यवस्थित करने में बहुत हेल्प करती है।

हायर एजुकेशन के लिए शिहाब को पैसे की आवश्यकता थी। इसके लिए उन्होंने सरकारी एजेंसी की परीक्षा की तैयारी की। कमाल की बात यह है कि उन्होंने विभिन्न सरकारी पदों की ओर से आयोजित होने वाली 21 परीक्षाओं में सफलता हासिल की। इसके चलते उन्होंने वन विभाग, जेल वार्डन और रेलवे टिकट परीक्षक जैसे पोस्ट पर काम भी किया।

सिर्फ 25 साल की उम्र में ही इन्होंने पहली बार सिविल सर्विस का एग्जाम दिया। उन्‍होंने अपनी जिंदगी को संवारने के लिये एक सरकारी स्कूल में पढ़ाने से लेकर केरल जल प्राधिकरण में एक चपरासी के रूप में भी काम किया। इसके बाद उन्‍होंने अपने सपने को साकार करने की जिद बना ली। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में सफलता हासिल की।

मीडिया से मिली जानकारी के मुताबिक उन्होंने अब तक विभिन्न सरकारी एजेंसियों द्वारा आयोजित 21 परीक्षाओं को पास किया है। मैनें वनविभाग, जेल वार्डन और रेलवे टिकट परीक्षक के पोस्ट के लिए भी परीक्षा दी। शिहाब के अनुसार मैंने 25 साल की उम्र से ही सिविल सेवा की परीक्षा देने का सपना देखना स्टार्ट कर दिया था।

UPSC परीक्षा में अपना भाग्य आजमाने का मन अनाथालय में रहते हुए बना लिया था। वहां सभी ने उनका हौसला बढ़ाया। लंबे संघर्ष के बाद शिहाब ने 226 वीं रैंकिंग के साथ यूपीएससी परीक्षा पास की। उनका मानना है कि जमीनी हकीकत की समझ उन्‍हें लोगों की बेहतर सेवा करने में हेल्प करेगी।

मीडिया को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, मैं बिस्तर की चादर और तकिए की आड़ में तिरछी रोशनी में पढ़ता था ताकि डोरमेटरी के पड़ोसी बेड में सो रहे अपने दोस्तों को परेशान न कर सकूं। अनाथालय में रहते हुए उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की और दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से इतिहास में ग्रेजुएशन किया।

2011 के UPSC एग्ज़ाम में मोहम्मद अली शिहाब को 226वीं रैंक मिली थी। विषम परिस्थितियों के चलते बचपन मे अच्छी शिक्षा के अभाव के चलते शिहाब की अंग्रेजी में पकड़ अच्छी नहीं थी, जिसके चलते उन्हें इंटरव्यू के दौरान ट्रांसलेटर की ज़रूरत पड़ी, ऐसे में उन्होंने 300 में से 201अंक प्राप्त किए। इन दिनों शिहाब नागालैंड के कोहिमा में पदस्थ हैं।

अपनी सफलता का पूरा श्रेय शिहाब अपने अनुशासन को देते हैं। अपने सामने आने वाली सभी कठिन परिस्थितियों का सामना शिहाब ने कठिन परिश्रम, लगातार कोशिशों और अनुशासन के बल पर ही किया और सफलता को अपने नाम किया।

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