बाबा हरभजन ऐसे भारतीय जवान जो शहीद होने के बाद भी देश की रक्षा कर रहे

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Ghost Of Baba Harbhajan Singh, The Hero Of Nathula. Baba Harbhajan Singh Memorial Temple. Baba Harbhajan Singh Mandir, Gangtok, Sikkim.

File Image Credits: Twitter

Delhi: हम सब अपने घरो में चेन से सिर्फ और सिर्फ उन सैनिको की वजह से रहते है, जो हमारे देश के बॉर्डर पर पदस्थ रहते है। सैनिक हमारी रक्षा के लिए 24 घंटे कार्यतक रहते है। बहुत से सैनिक हमारे सुरक्षा के लिए दु-श्मन से लोहा लेते हुए वीरगति को प्राप्त हो जाते है। लेकिन कभी यह सुना है की कोई सैनिक वीरगति को प्राप्त होने के बाद भी अपनी ड्यूटी कर सकता है, क्या सैनिक की आत्मा अपना कर्तव्य निभाते हुए देश की सीमा की रक्षा कर सकती है।

यह सब पढ़ने में अजीब लगता है, लेकिन ये बात गलत नही है जानकारी के अनुसार बता दे सिक्किम राज्य में एक जगह है नाथूला दर्रा जंहा पर जाकर अगर ये सवाल किया जाये, तो वँहा के लोग ताहि कहेंगे ये सब से है। ये कहानी आपको सोचने को मजबूर कर देगी की ऐसा कैसे हो सकता है।

िक्किम में भारत-चीन सीमा पर एक सैनिक ऐसे भी हैं, जो प्राण जाने के बाद के 48 साल बाद भी सरहद की रक्षा कर रहे हैं। सुनने में लोगो को बहुत अनसुलझी बात लगती, लेकिन ये बात सच है, भारतीय सैनिक बाबा हरभजन सिंह के मंदिर में चीनी सेना भी सिर झुकाती है। आखिर कौन हैं, यह बाबा जिसका भारतीय सेना ने 14 हजार फीट की ऊंचाई पर मंदिर बनवाया हुआ है। लोगों का भी ऐसा ही मानना है और दूर-दूर से लोग यहां बाबा हरभजन सिंह के मंदिर में पूजा करने आते हैं।

ाबा हरभजन सिंह ने कपूरथला के ब्रोंदल गांव में ही स्कूली पढ़ाई की। आगे की पढ़ाई के बाद जून 1956 में अमृतसर में एक सैनिक की तरह जोइनिंग हुई और वहां सिग्नल कोर में शामिल कर लिए गए। 10 सालों बाद 14 राजपूत रेजिमेंट में पदस्थ हुये। यहीं पदस्थ रहते हुए बाबा ने साल 1965 के भारत-पाकिस्तान जंग में अपनी यूनिट में काफी बहादुरी के साथ ताकत दिखाई।

30 अगस्त 1946 को पंजाब वर्तमान पाकिस्तान के सदराना गांव में जन्में हरभजन 1966 को भारतीय सेना के पंजाब रेजिमेंट में सिपाही के रूप में पदस्थ रहे। इसके बाद 1968 में 23वें पंजाब रेजिमेंट के साथ पूर्वी सिक्किम में पदस्थ हुये थे। चार अक्टूबर 1968 को खच्चरों का काफिला ले जाते समय नाथुला के पास उनका पैर फिसल गया और घाटी में गिरने से उनके प्राण चले गए। पानी तेज होने के कारण उनका शरीर बहकर दूर चला गया।

मीडिया जानकारी के मुताबिक, 1968 में हरभजन के प्राण जाने के बाद पिछले 52 साल से उनकी आत्मा देश की सीमा पर भारतीयों की रक्षा कर रही है। भारतीय सैनिकों का कहना है कि हरभजन की आ-त्मा, चीन की तरफ से होने वाले ख’तरे के बारे में पहले से ही उन्हें संकेत कर देती है। इतना ही नही खुद चीनी सैनिक भी इस बात पर भरोसा करते हैं।

जानकारी के अनुसार बताया जाता है कि जब भी भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच किसी मुद्दे को लेकर वार्तालाप होती हैं, तो हरभजन सिंह के लिए एक कुर्सी अलग से लगाई जाती है। उनका मानना है की इस वार्तालाप में हरभजन सिंह भी आते है और वार्तालाप का हिस्सा बनते है।

बाबा हरभजन सिंह, एक सैनिक जो वीरगति को प्राप्त होने के बाद देश की सीमा की रक्षा करने में आज भी खड़े हुए है। हरभजन बाबा एक ऐसा सैनिक जिसे भारतीय सेना ने उसकी वीरगति होने के बाद भी ड्यूटी पर पदस्थ रखा और रिटायर होने के बाद भी, जिसके होने का अहसास भारत-चीन बॉर्डर पर तैनात सेनिको को आज भी होता है।

भारत-चीन के बीच होने वाली हर फ्लैग वार्तालाप में उनके लिए एक कुर्सी लगाई जाती है। इस बात को यकीन मानना शायद हम सब के लिय असंभव हो, लेकिन सच तो ये है कि बाबा हरभजन सिंह के नाम से गंगटोक में जेलेप्ला दर्रे औऱ नाथुला दर्रे के बीच एक मंदिर भी है।

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