भारत की एक ऐसी बेटी भी है, जिसे विदेशी धरती पर नमन किया जाता है, राष्ट्रीय हीरो है

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Noor Inayat Khan Spy
British National Hero during World War 2 was the Indian Origin Noorunissa Inayat Khan. Noor Inayat Khan who worked as an Allied wireless officer during the Second World War and was executed at Dachau in 1944.

Photo Credits: Twitter

Bhopal: वैसे तो भारत की बेटियों ने देश और विदेश में बहुत नाम कमाया है और विदेशों में भी भारतीय मूल की महिलाओं और बेटियों का बोल बाला रहा है। अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी की वाइस प्रेसीडेंट पद की उम्मीदवार रही कमला हैरिस ने अमेरिकी चुनावों बहुत सुर्खिया बटोरी थी। एक और अन्न भारतीय मूल की अमेरिकी कांग्रेस की पहली हिन्दू महिला के रूप में तुलसी गब्बार्ड का नाम भी बहुत हाईलाइट रहा है। अमेरिका में अन्न भारतीय महिलाएं उच्च पदों पर आसीन है।

इसी प्रकार इंग्लैण्ड में भी भारत की एक बेटी को नमन किया जाता है और सलामी दी जाती है। बता दे की लंदन में भारत की इस बेटी का नाम नूरुन्निसा इनायत खान (नूर इनायत खान) था, जिसकी बहादुरी और बलिदान को ब्रिटेन में तहे दिन से याद किया जाता है। नूरुन्निसा (Noorunissa Inayat Khan) के माता पिता भारत के एक सम्मानीय मुस्लिम खानदान के वारिस थे।

ऐसा कहा जाता है की नूर (Noor Inayat Khan) की मां कर्णाटक के टीपू सुलतान की संबंधी थी और उसकी दादी ओरा बेकर एक अमेरिकन महिला थी।पुरानी मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जाता है की नूर का भाई भी अमेरिकी था। नूर अमेरिका में भारतीय मूल की ज़रूर थी, परन्तु जन्म से रूसी थी, मतलब उसका जन्म मास्को में हुआ था। आज से 106 साल पहले वर्ष 1914 में मास्को में नूर जन्मी थी। बाद में 5 साल की उम्र में परिवार सहित लंदन आ गई थी।

नूर जब 6 वर्ष की थी, तब उसका परिवार फ्रांस आकर बस गया था। यहीं पढाई के बाद नूर ने 25 साल की उम्र में अपनी पहली पुस्तक लिखी थी, जो बुद्ध की जातक कथाओं पर आधारित थी। द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारम्भ में नूर का परिवार लंदन शिफ्ट हो गया और वहां नूर ने ब्रिटिश आर्मी ज्वाइन कर ली। उसे ब्रिटिश आर्मी में वायरलेस आपरेटर की पोस्ट प्राप्त हुई थी। यहाँ उसने बखूबी काम किया।

इसके बाद साल 1943 में नूर को उसकी खुबिया देखते हुए ब्रिटिश खुफिया विभाग में नौकरी प्रदान की गई। ब्रिटिश सरकार ने उसे बड़ा ज़िम्मा दिया और उसे फ़्रांस भेज दिया गया, जहां नूर ने जर्मनी की बड़ी ही डेंगर नाजी सेना के खिलाफ जासूसी का ज़िम्मा संभाला।

उस वक़्त नूर का काम इतना ज़बरदस्त रहा की उस समय सारी दुनिया में नूर से बड़ा कोई जासूस नहीं रहा होगा। फिर दुर्भाग्य से एक दिन साल 1944 में नूर पकड़ी गई। तब नाजियों ने नूर को बहुत यातनाएं दी, जिससे वह अपने प्राण त्याग गई। नूरुन्निसा के इस त्याग को ब्रिटेन के लोग आज तक याद करते है। नुरुन्निसा के सम्मान में लंदन के ट्रैफलगर स्क्वेयर पर उनके नाम की एक नीली तख्ती लगाई गई है और नूर की एक मूर्ति भी है। उनके नाम और तस्वीर के साथ एक पोस्टल कार्ड भी जारी किया गया है।

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