इन दो युवकों ने ऐसी मशीन बनाई, जो पराली को बायो कोयला बना देती है, बड़ी समस्या का समाधान भी निकला

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stubble into bio coal
These two Haryana boys are making bio coal made from stubble. They convert farmer stubble into bio coal. This is very useful for farmers.

Photo Credits: Social Media

Delhi: पहला प्रश्न तो यही बनता है कि पराली क्या होता है? तो हम आपको बता दें पराली, धान की फसल की कटाई के बाद बचा हुआ बाकि का हिस्सा होता है। जिसकी जड़ें धरती में होती हैं। किसान फसल के पकने के बाद ऊपरी हिस्सा काट लेते हैं, क्योंकि ऊपरी हिस्सा ही काम का होता है, बाकी अवशेष होता है।

किसानों को अगली फसल लगाने के लिए खेत को खाली करना होता हैं, तो वह बाकि बचे हिस्से को जला देते है। मशीनें धान का सिर्फ ऊपरी हिस्सा काटती हैं और काफी मात्रा मे अवशेष बचता है। इसे हरियाणा पंजाब में पराली (Paraalee) कहा जाता है।

इसी को जलाने (Stubble Burning) से राजधानी दिल्ली में स्मॉग की समस्या के लिए हरियाणा एवं पंजाब को जिम्मेदार माना जाता है और इसी के कारण अक्टूबर से नवंबर माह में प्रदूषण भी बढ़ जाता है। पिछले कुछ सालों से सरकार ने इसको रोकने के लिए कई नियम कानून लागू किये। लेकिन इस समस्या का कोई हल नहीं निकला है।

इस स्थिति को समझते हुए हरियाणा के हिसार (Hisar) के रहने वाले मनोज नेहरा (Manoj Nehra) और विजय श्योराण (Vijay Sheoran) ने दो सालों तक कड़ी मेहनत की और ऐसा प्रोजेक्ट तैयार किया। जिससे पराली से बायो कोयला बना सके। इस कोयले को फार्मर कोल (Farmer Coal) का नाम दिया।

कैसे बनाए जाते है पराली से कोयला

मनोज और विजय के इस प्रोजेक्ट के अनुसार पराली के माध्यम से कोयला (Stubble To Coal) बनाए जाते है। जिसके लिए गाय के गोवर (Cow Dung) से बनी कंपोस्ट में पराली को मिलाकर ब्रीकेटिंग मशीन से कोयला बनाया जाता है। सबसे पहले पराली को ग्राइंडर में पीसा लिया जाता है और उसके बाद उसमें 70 प्रतिशत पराली का पाउडर और लगभग 30 प्रतिशत पशुओं के गोबर का कंपोस्ट को अच्छी तरह मिला लिया जाता है।

जिसके बाद तैयार किए गए मिश्रण को ब्रीकेटिंग मशीन (Briquetting Machine) में डाल कर प्रेस कर छोटे-छोटे पैलेट बना लिए जाते हैं। इन पैलेट को कोयले के रूप में उपयोग किया जाता है। इस तकनीक से जो फार्मर कोल बनाया गया इससे किसानों को भी काफी प्रॉफिट हुआ। अब उनके खेत से निकला वेस्टेज को जलाया नही जाता और जलाने की वजह से उनकी जमीन की उर्वरकता में कोई नुकसान नही होता।

पराली के न जलाने से 50 प्रतिशत कम हुआ प्रदुषण

युवा उद्यमी विजय श्योराण और मनोज नेहरा से बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि पराली के जलाने के कारण दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्र में गैस का चेंबर बन जाता है। उन दिनों धुंए की बजह से विजिबिलिटी के साथ सांस लेने में भी परेशानी आने लगती है।

ऐसी स्थिति में यदि 50 प्रतिशत भी पराली की खपत इन प्लांट्स के माध्यम से हो जाता है। तो प्रदूषण से काफी राहत मिलेगी। जिन फैक्ट्रियों में काला कोयला उपयोग होता है, तो उन्हें पराली से बने कोयले को 20 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचे जाते है। ऐसे में कोयले के विकल्प में बायोकोल का उपयोग किया जाए और काले कोयले की तुलना में यह कम प्रदूषण करता है और सल्फर ऑक्सीएड्स भी बनता है।

युवा किसान से बने युवा उद्यमी

उद्यमी विजय श्योराण बताते है कि वह स्वयं इनका उपयोग कर रहे हैं और अब तक 250 टन से ज्यादा का उत्पाद बनाकर कई अलग-अलग शहरों में भेज चुके हैं। इस फार्मर कोयले के रिजल्ट काबिले तारीफ रहे। जिससे उनका मनोबल बढ़ा।

वहीं तकनीकी तौर पर कहा जाए तो इस कोयले की कैलोरिफिक वैल्यू 5 हजार है, जोकि बाजार में मिलने वाले साधारण कोयले से बेहद अच्छी है और जो कोयला ईंट भट्टों में उपयोग होता है उसका प्राइज 14 से 20 रुपये प्रति किलो ग्राम है औऱ इस तकनीक से बना कोयला 7 से 8 रुपये प्रति किलो ग्राम में बेचा जाता है।

पराली की खपत में हो सकती है बढ़ोतरी

इस तकनीक के माध्यम से हर महीने लगभग ढाई सौ एकड़ की पराली का उपयोग किया जा सकता है। अगर इस तकनीक का ज्यादा उपयोग किया जाए, तो पराली जलाने से हो रहे प्रदूषण को जल्द ही रोका जा सकेगा।

इस तकनीक के माध्यम से एक एकड़ की पराली से लगभग 3 टन कोयला बनाया जा सकता है। इस प्लांट की कैपिसिटी रोजाना 10 टन कोयला बनाने की है। पराली के इस्तेमाल होने से किसानों को पराली के सही दाम भी मिलेंगे और उनकी समस्या भी खत्म हो जाएगी।

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