बिहार की पहचान बनीं ‘मशरूम लेडी’ ने ऑयस्टर मशरूम की खेती का सही तरीका बताया, ऐसे करें

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Mushroom Lady Anita Devi Bihar
Anita Devi The Mushroom Lady of Bihar. How this woman farmer changed the lives of hundreds of women in Bihar via Mushroom production.

Nalanda: हम चाहे शहर कि महिला की बात करे या गावं की, सभी को अपना जीवन यापन करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। शहर में तो रोजगार मिल जाता है, परन्तु गावं में लोग कृषि पर निर्भर है, इसी बीच एक महिला किसान अनीता देवी, जो कि बिहार के नालंदा जिले के अनंतपुर गावं (Anantpur Village) की महिला है।

अनीता देवी (Anita Devi) ने 1 किलोग्राम मशरूम के उत्पादन (Mushroom Production) शुरू किया और अब 50 किलो मशरूम प्रतिदिन उत्पादित करती है और पुरे देश में आज मशरूम लेडी (Mushroom Lady) के नाम से जानी जाती है।

सुनेहरा अवसर

प्राचीन काल में किसान भाई धान गेहूं चना की फसल का उत्पादन करते थे, वह मशरूम के बारे में जानते भी नहीं थे। अनीता देवी ने अपने पिता जी से मशरूम के बारे में सुना था, परन्तु उन्होंने कभी न तो उसे देखा था न ही उसको जाना था। अक्सर कम भूमि और कम पूंजी के आभाव से किसान भाइयों को कृषि करना एक चुनौती सी लगती है।

अनीता देवी एक किसान परिवार से थी। उन्होंने अपने मायके और ससुराल में अच्छे से समझा था की पारंपरिक तरीके से की गई, किसानी से अधिक मुनाफा नहीं कमाया जा सकता। वह सुशिक्षित थी, उन्होंने स्नातक किया हुआ था और एक जागरूक महिला किसान थी, इसलिये उन्होंने मशरूम की खेती (Mushroom Farming) करने का विचार बनाया।

शुरुआत कैसे हुई

अपने पिता से मिली इन्फॉर्मेशन के साथ अनीता देवी ने स्टार्टिंग की उन्होने बताया की जब वह बिरसा मुंडा कृषि विश्व विद्यालाए में आयोजित एक सेमीनार में शामिल होने का अवसर मिला, तब उन्होंने मशरूम के बारे में सही तरह से समझा। इसके बाद वो ट्रेनिंग के लिए कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (ATMA) संस्थान और कृषि विज्ञान केंद्र के अंतर्गत उत्तराखंड गईं।

जीवन यापन के लिए महिलायों का संघर्ष

उत्तराखंड स्थित गोविन्द बल्लभ पंत कृषि विश्वविद्यालय से 10 दिन की मशरूम उत्पादन ट्रेनिंग ली। अनीता देवी शुरुआत में वही से मशरूम के बीज (Mushroom Seeds) लेकर अपने गांव नालंदा के अनंतपुर आईं थीं। शुरू में तो उन्हें फायदा नही हुआ, तो कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों से उन्होंने वार्तालाप किया और फिर उसमे होने वाली कमियां को बारीकी से समझा फिर उसको सही किया।

शुरुआत में किसी ने उनका साथ नही दिया। लोग उन्हें ताने मा-रने लगे उनके मशरूम की खेती करने पर परन्तु उन्होंने अपने इरादो को मजबूत बना लिया था। आप के होसलो को कम नही होने दिया। अनीता देवी ने अपने साथ गांव की अन्य महिलाओं को भी प्रशिक्षण दिया और बड़े स्तर पर मशरूम उत्पादन करने लगीं।

उन्होंने महिलाओं को बीज और मशरूम उत्पादन करने के लिया ट्रेनिंग दिया। अपने उत्पाद को मार्केट में बेचने के लिए उनके पति अलग-अलग मंडियों में जाते हैं। होटल कारोबारियों से वर्तालाप करते हैं और ऑनलाइन भी बेचने के लिए रास्ते निकालते है। जिससे इसकी बिक्री अच्छी हो सके। आज ये हाल है कि खरीदार उनको ढूंढ़ कर खुद उनके पास आने लगे हैं।

खास बातों को ध्यान रखना

अनीता देवी कहती है की मशरूम की अच्छी पैदावार के लिए आस पास गन्दगी नही होनी चाहिए। क्योंकि गंदगी होने पर फसल में रोग का खतरा होने का डर हो जाता है। मशरूम के अच्छे बीज से लेकर भूसे के रखरखाव के बारे में सारी इन्फॉर्मेशन होनी चाहिए।

कई बार भूसा पहले से अच्छा नही होता है। उसमें नमी की मात्रा अधिक होने पर भूसे के खराब होने का डर सही साबित हो जाता है। इसलिए भूसा पर विशेष ध्यान देना चाहिए। ये भूसा कई बार लाल या काला भी हो जाता है, जिससे बैग में धब्बे जैसे नजर आने लगते है। इसलिए साफ भूसा लेना अति महत्वपूर्ण है।

100 ग्राम बीज से कम से कम 1KG मशरूम

अनीता देवी का कहना है कि मशरूम उत्पादित करने के लिए जो भी खेत में खर-पतवार उपलब्ध होते हैं, उनका उपयोग किया जा सकता हैं, लेकिन नए उत्पादकों के लिए गेहूं के भूसे का उपयोग करना सही साबित होता है। कारण ये है कि गेहूं का भूसा ज़ल्दी खराब नहीं होता है। इस भूसे में मशरूम के बीज की बिजाई अच्छे से की जा सकती है। इसे प्लास्टिक बैग में डालते हैं।

औसतन 16X20 आकर के प्लास्टिक बैग में 100 ग्राम बीज को डाला जाता है। अगर 16X28 का पैकेट हो तो फिर 200 ग्राम बीज डाला जाता है। 100 ग्राम बीज से कम से कम 1 KG मशरूम तैयार हो जाता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि बैग में पैक करने के बाद छेद किए जाने आवश्यक हैं।

अनीता देवी का कहना हैं कि जिस तरह हमें सांस लेने के लिए ऑक्सीज़न की आवश्यकता होती है, वैसे ही मशरूम को भी चाहिए होती है। अगर सही तरह से मशरूम को हवा नहीं मिल पाती, तो फिर उस बैग में जो बीज डालते हैं, वो खराब होने शुरू हो जाते हैं।

अनीता देवी ने बहुत सारी आवश्यक बात बताई जो मशरूम की पैदावार के लिए जरूरी है, बटन मशरूम में तो केमिकल फर्टिलाइज़र का उपयोग किया जाता है, लेकिन ऑयस्टर मशरूम (Oyster Mushroom) को वो जैविक तरीके से ही उगा रही हैं।

उनका कहना है कि बटन मशरूम में केमिकल खाद का उपयोग करना ही पड़ता है, लेकिन ऑयस्टर मशरूम की जैविक खेती मुमकिन है। भूसे में गर्म पानी का उपयोग करना चाहिए। सितंबर से मार्च तक मशरूम के लिए सबसे अच्छा अनुकूल मौसम होता है।

इस दौरान माइसेलियम ग्रो सही होता है। बटन और ऑयस्टर दोनों के बीज में कोई ज्यादा अंतर नजर नही आता। सफेद रंग का ही फंगस होता है, लेकिन फसल का तरीका थोड़ा हट के होता है। बटन की बिजाई कंपोस्ट बनाकर करते है।

ऑयस्टर मशरूम को भूसे में मिलाकर पैकिंग करते हैं। ये लेयरिंग के रूप में भी कर सकते हैं या पूरा मिलाकर, दोनों तरह से कर सकते हैं। अनीता देवी मशरूम लेडी ऑफ़ बिहार (Mushroom Lady Of Bihar) यह उपाधि स्वंय में ही एक गर्व की बात है की आज की महिला भी हर क्षेत्र में आगे है।

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