UP का किसान एक एकड़ खेत में 50 से ज्यादा फसलें ऊगा रहा, ऐसे 5 साल में आठ गुना आमदनी बढ़ाई

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Gorakhpur farmer Harishchandra
Farmer's Farming and income file photo.

Gorakhpur: आज के समय में पैसा ही सब कुछ है व्यक्ति पैसों से ही अपने ऐसो आराम खरीद पाता है। इसीलिए व्यक्ति हर वह संभव काम करता है, जिससे उसे इनकम हो एक समय ऐसा था कि किसान भाई कर्ज में डूब कर आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते थे।

कृषि विज्ञान ने उनके जीवन में भी एक नई तरक्की लाई है कृषि विज्ञान के वैज्ञानिकों ने अपनी शोध से किसान भाइयों के लिए नई नई तकनीकों का आविष्कार किया और उन्हें किसानी से ही ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए प्रेरित किया।

Farmers Farm in India

देश में आधुनिक खेती और जैविक खेती (Organic Farming) की एक सकारात्मक लहर चल रही है, जिसमें सभी किसान भाई अपनी पारंपरिक खेती के साथ इस आधुनिक खेती को करके ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमा रहे हैं। ऐसे ही एक किसान भाई हरीशचंद्र जो यूपी राज्य के गोरखपुर के निवासी हैं। इस किसान भाई का एक समय ऐसा था कि यह अपनी फसल से अपनी लागत भी पूरी प्राप्त नहीं कर पाते थे, ऐसे में उन्हें घाटा ही लगता था।

उन्होंने कृषि विज्ञान की इन तकनीकों को समझा और उस पर अमल करना प्रारंभ किया आज वह मात्र 5 साल में अपनी आमदनी को 80000 Ru साल में पहुंचा दिया। उन्होंने 1 एकड़ जमीन को सोना बना दिया। तो आइए जानते हैं किसान भाई हरीशचंद्र की सफलता का राज।

ऐसे की शुरुआत

जहां चाह होती है वहीं राह होती है। व्यक्ति चाहे तो हर वह काम कर सकता है, जिसकी लोग अपेक्षा भी नहीं कर सकते। यदि व्यक्ति आपर्याप्तता का रोना रोएगा, तो शायद वह कभी कुछ नहीं कर सकता इसीलिए हमेशा शुरुआत अच्छी करनी चाहिए।

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के गोरखपुर (Gorakhpur) क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला कोडिया इलाके का एक गांव जिसका नाम पंचगामा है। वहां के निवासी हरिश्चंद्र ने अपनी जमीन पर 50 प्रकार की फसलों को लगाया है। यह 50 प्रकार की फसलें केवल 1 एकड़ जमीन पर उग रही हैं। अक्सर किसान अपनी अच्छी फसल ना उगने पर अपनी जमीन की कमी को बताते हैं परंतु हरिश्चंद्र (Harishchandra) ने इसके लिए हल निकाल लिया है।

Money
Money Presentation Photo

हरिश्चंद्र बताते हैं कि उन्होंने जैविक खेती के माध्यम से फसलों में अच्छी पैदावार की और आज उनकी इनकम 10 गुना बढ़ गई है एक समय ऐसा था कि वे 10000 Ru भी बड़ी मुश्किल से कमा पाते थे और आज वह 80000 Ru साल का बचाते हैं।

अन्य किसान भाइयों के लिए हैं उनके गुरु

हरीश चंद्र भी एक सीमांत किसान की तरह अपना जीवन यापन कर रहे थे। सीमांत किसान वे होते हैं जिनके पास जमीन का अभाव होता है या फिर बहुत कम जमीन होती है, जिसकी वजह से वह अपने काम को अच्छी तरह नहीं कर पाते।

2017 से उनकी किस्मत में बदलाव आया जब उन्होंने अपने हुनर को आगे लाने का प्रयास शुरू किया, इसके बाद वर्ष 2018 में जब उनके गांव को डीसीटी याने डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की योजना के अंतर्गत चुना गया।

हरीशचंद्र को एक मॉडल की तरह चुना गया। गोरखपुर इन्वायरमेंटल एक्शन ग्रुप के संचालकों ने उन्हें जैविक खेती के जरिए सब्जियों की खेती करने की सलाह दी, जिस पर उन्होंने फोरन काम करना प्रारंभ कर दिया। इतना ही नहीं उन्होंने जैविक खाद के लिए भी खुद पर भरोसा किया और खुद से जैविक खाद का निर्माण किया।

उनकी सलाह से इस किसान भाई को काफी लाभ हुआ उस लाभ का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने समय के साथ अपनी फसलों पर भी इजाफा किया फल स्वरुप आज वह 50 प्रकार की फसल उगाते हैं।

ज्यादा प्रकार की फसलों को लगाने का फायदा यह है कि वर्तमान समय में फसलें मौसम की चपेट में आ जाती है और इस वजह से काफी ज्यादा नुकसान होता है, परंतु ज्यादा फसल लगाने से कई फसलें ऐसी भी होती है जो हमें उस नुकसान को वसूल करा देती है। किसान हरिश्चंद्र आज अन्य किसानों के लिए मास्टर ट्रेनर है।

पाली और ग्रीन हाउस में होती है नर्सरी तैयार

काफी लोगों से कहते सुना है कि पैसों से पैसे आते हैं यह कहावत एकदम सत्य है जब हरिश्चंद्र ने अपना काम शुरू किया उस समय वे केवल अपनी फसलें ऊगाया करते थे, परंतु आज वे उन फसलों के बीज से नर्सरी भी स्वयं तैयार करते हैं।

उनका आय का एक और रास्ता यह भी बन गया है कि वे बाहर से पौधे ना मंगा कर खुद के द्वारा बनाई गई नर्सरी का इस्तेमाल करते हैं और उन पौधों को अन्य किसानों को भी बेचते हैं इस नर्सरी को बनाने के लिए उन्होंने पॉलीहाउस और ग्रीनहाउस भी बना रखा है।

स्वयं करते हैं खाद और कीटनाशक का निर्माण

किसान हरिश्चंद्र ने स्वयं से खाद और कीटनाशक का निर्माण भी प्रारंभ कर दिया है वह बाजार के कीटनाशक और खाद का इस्तेमाल करने से बचते हैं वे कहते हैं कि यदि हम मार्केट का कीटनाशक और खाद का इस्तेमाल करेंगे तो जैविक खेती का कोई फायदा नहीं होगा।

जैविक खेती में हम रसायनों का इस्तेमाल नहीं कर सकते इसलिए वे अपने द्वारा निर्मित नीम ऑयल का इस्तेमाल और मटका कीटनाशक का इस्तेमाल करते हैं। खाद के लिए यह नाडेप कंपोस्ट और वर्मी कंपोस्ट
वार्मिंग बॉस और हरी खाद मटका खाद का इस्तेमाल करते है।

इसके अंतर्गत भिंडी, लौकी, चुकंदर, नेनुआ, कुंदरू, करैला, प्याज, मटर, लेहसुन, बोड़ा, मेथी, पालक, मूली, तरोई, धनिया, टमाटर, गेहूं, आलू, सरसो, हरी मिर्च, सरपुतिया, बंडा आदि जैसी 50 उत्पादों की फसलों को लगाते है और उससे मुनाफा कमाते है।

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