भारत में लड़कियों को शिक्षा का अधिकार दिलवाने में भूमिका निभाने वाली शिक्षिका सावित्रीबाई फुले का संघर्ष

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Savitribai Phule Woman Teacher
Savitribai Phule India's First Woman Teacher journey in Hindi. The inspiring story of Savitribai Phule, the first woman teacher in India.

File Photo

Pune: पुराने जमानें में जहाँ लोगों कि सोच थी कि लड़कियों का काम सिर्फ घर संभालना है, उनकी इस सोच के बीच देश में बालिकाओं को शिक्षित करने का रास्‍ता बनाने वाली शिक्षिका सावित्रि बाई फुले को आज पूरा देश श्रद्धांजलि दे रहा हैं।

आज हमारे भारत देश में लड़कियों और महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए उनकी शिक्षा एवं स्‍वास्‍थ्‍य को सुधारने के लिए देश की सरकार कई तरह की योजनाएं चला रही है, जिसका लाभ सभी प्राप्‍त कर रहे है।

इससे महिलाओं के बीच जागरूकता बढ़ रही है, लेकिन 19वी सदी में देश की बेटी सावित्रि बाई फुले (Savitribai Phule) ने देश की महिलाओं को आगे बढ़ाने एवं उन्‍हें अपनी योग्‍यता का एहसास कराने के लिए एक समाज सेविका (Social Worker) के रूप में कार्य किया।

सवित्रिबाई जी एक शिक्षिका (India’s First Woman Teacher) थी, उन्‍होंने समाज में व्‍याप्‍त रूढ़ीवादी परंपरा एवं महिलाओं के विरूद्ध हो रहे अत्‍याचार को दूर करने के लिए ना सिर्फ प्रयास किये बल्कि महिलाओं को शिक्षित करने के लिए नये मार्ग का सृजन भी किया।

सावित्रिबाई फुले ने समाज में व्‍याप्‍त रूढीवादी परंपरा एवं कुरितियों का डट कर सामना किया एवं देश कि लड़कियों को शिक्षित करने के लिए कई समस्‍याओं का सामना अपने आत्‍मविश्‍वास के साथ किया और उसमें मुकाम भी हासिल किय।

सावित्रिबाई का जन्‍म 1831 ई. में महाराष्‍ट्र में एक धनवान परिवार में हुआ था। उनके पति का नाम ज्‍योतिराव फुले था। उन्‍होंने अपने पति के साथ मिलकर देश में व्‍याप्‍त कुरितियां जैसे छुआछूत, सतीप्रथा, विधवा-विवाह, बाल-विवाह और फैले अंधविश्‍वास को दूर करने का अथक प्रयत्‍न किया।

सावित्रिबाई फुले एवं उनके पति ज्‍योतिराव फुले दोनों ने साथ में मिलकर महिलाओं को शिक्षित करने के लिए पहली पाठशाला की शुरूआत की दोनों ने साथ में मिलकर लैंगिक भेदभाव एवं जातिवाद को दूर करने के लिए इनके विरूद्ध प्रदर्शन किया एवं कई तरह की चुनौतियो का सामना किया।

सावित्रिबाई फुले का विवाह 9 वर्ष की आयु में 1940 में ज्‍यातिराव के साथ हो गया था। उनकी कोई संतान ना होने के कारण उन्‍होंने यशवंतराव को गोद ले लिया था। सावित्रिबाई को शादी के पहले पढ़ना-लिखना नहीं आता था, परंतु उनके पति ज्‍यातिराव ने उन्‍हें पढ़ना-लिखना सिखाया।

सब सीखने के बाद महिलाओं के बारे में सोचते हुये सावित्रिबाई एवे उनके पति ने साथ में एक लड़कियों के लिए स्‍कूल खोला, जहॉं पर उन्‍होंने शिक्षिका के रूप में कार्य किया एवं महिलाओं को शिक्षित करने में अपना योगदान दिया।

सावित्रिबाई फुले ने अपने पति ज्‍योतिबा के साथ 1848 में महाराष्‍ट्र के शहर पुणे में एक विद्यालय खोला, जो कि महिलाओं के लिए था। उनके इस विद्यालय में 9 लड़कियों ने एडमिशन लिया। सावित्रिबाई जी उस स्‍कूल की प्रिेसिपल थी।

उनका यह महिलाओं के लिए पहला कदम था। इसके बाद महिलाओं को शिक्षित करने के लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने एवं महिलाओं को उनके मूलभूत अधिकार दिलाने के उद्देश्‍य में कई समस्‍याओं का सामना करते हुये महिलाओं को हक दिलाया।

19वी शताव्‍दी मे हमारे समाज में बाल विवाह कि प्रथा थी। कम उम्र में विवाह होने के कारण लड़किया छोटी सी आयु में ही विधवा हो जाती थी और उन्‍हें छोटी सी उम्र में ही समाज की कई रूढीवादी परंपरा एवं समाज में व्‍यापत कुरितियों का सामना करना पड़ता था।

इस समस्‍या को दूर करने के लिए सावित्रिबाई फुले एवं उनके पति ने कई कदम उठाये। उनके इस प्रयास में उस समय कि ब्रिटिश सरकार ने उनका साथ दिया एवं कई सुधार आंदोलन करने में मदद की।

सावित्रिबाई एवं ज्‍योतिराव ने जिस पुत्र को गोद लिया था, वह एक ब्राहम्‍ण परिवार से था, उनके पुत्र का नाम यशवंत था। यशवंत ने मेडिकल की पढ़ाई की थी। पढ़ाई करने के बाद उन्‍होंने 1897 जिस समय प्‍लेग की बीमारी अपने चरम पर थी, उस समय एक हॉस्पिटल खोला, जिसमें वह अपनी मॉं के साथ मिलकर मरीजों का इलाज एवं देखभाल किया करते थे।

मरीजों कि सेवा करते करते एक दिन सावित्रिबाई खुद भी प्‍लेग रोग से ग्रसित हो गई एवं 10 मार्च 1897 को स्‍वर्ग सिधार गई। उन्‍होने अपने सेवा भाव एवं महिलाओं को शिक्षित करने के प्रयास एवं समाज की कुरितियों को खत्‍म करने में अपना जो योगदान दिया। उससे वह इतिहास के पन्‍नों में हमेशा के लिए अमर हो गई है। आज हम उन्‍हें देश कि पहली शिक्षिका के तौर पर जानते है।

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