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Kochi, Kerala: मशरूम एक ऐसा उत्पाद है, जिसमे भरपूर मात्रा में प्रोटीन और मिनरल्स पाये जाते है। जो शरीर के लिए काफी फायदे मन्द है। अलग-अलग राज्यों में किसान मशरूम की खेती कर अच्छी कमाई कर रहे हैं, कम जगह और कम समय के साथ ही इसकी खेती (Mushroom Ki Kheti) में खर्च भी बहुत कम लगता है, जबकि फायदा लागत से कई गुना अधिक मिल जाता है।
मशरूम की खेती (Mushroom Farming) करने के लिए किसान किसी भी कृषि विज्ञान केंद्र या फिर कृषि विश्वविद्यालय में प्रशिक्षण ले सकते हैं। विश्व में मशरूम की खेती हजारों वर्षों से की जा रही है, जबकि भारत में मशरूम के उत्पादन का इतिहास करीब तीन दशक पुराना है।
भारत में 10-12 वर्षों से मशरूम के उत्पादन में लगातार इजाफा देखा जा रहा है। इस समय हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना व्यापारिक स्तर पर मशरूम की खेती करने वाले प्रमुख उत्पादक राज्य में से एक है।
प्राचीन काल में मशरूम के बारे में ज्यादा जानकारी नही होती थी। इसके लाभ किसी को पता नहीं थे। इसलिए इसका उत्पादन नहीं होता था। परंतु आज भारत के हर हिस्से में इसकी हर किस्मो की खेती हो रही है। क्योंकि भारत इसके फायदे जान चुके है। जिनके हौसलों में जान होती है, उनके सपनों में उड़न होती, इस बात को सच साबित कर दिखाया है, माँ बेटे (Mother and Son) की जोड़ी ने।
माँ बेटे की एक ऐसी जोड़ी, जिन्होंने साथ मिलकर मशरूम उत्पादित किये और अब प्रतिदिन 40 हजार रुपए का बिज़नेस करते है। माँ शब्द में कितनी ताकत है इस बात का प्रतिक है, ये माँ बेटे की जोड़ी। आइये जानते है कैसे की शुरुआत।
कैसे की शुरुआत और कितने समय से चल रहा काम
जिथू थॉमस और उनकी माँ केरल (Kerala) राज्य के निवासी है। मां-बेटे (Jithu Thomas and his mother Leena Thomas) ने मिलकर एक नई पहल की। ये जोड़ी पिछले 4 साल से मशरूम की खेती कर रहे है। बीते कुछ सालों में उनको हर दिन अपने काम में सफलता मिली। जिससे उनके हौसलो को उड़ान मिलना शुरू हो गई।
इससे उनको अपने काम को बढ़ाने की हिम्मत मिली। माँ बेटे की इस जोड़ी ने ना केवल अपना फायदा देखा बल्कि, अन्य गरीब कामगारों को भी रोजगार दिलवाया। मां-बेटे की इस जोड़ी को यह काम करते हुए करीब चार वर्ष हो रहे हैं। इन चार सालों में उन्हें अपने काम में दिन-प्रतिदिन सफलता हासिल हुई है।
कम उम्र में ही कार्य की योजना बना ली
एक रचनात्मक दिमाग ही है, जो अच्छे कामो को करने में मदद करता है। केरल राज्य के एर्नाकुलम शहर के रहने वाले जिथू थॉमस बचपन से ही इनका दिमाग रचनात्मक तरह से चलता था। जिसके चलते इन्होंने बचपन से ही नए-नए प्रयोग करते रहे।
जब जिथू थॉमस (Jithu Thomas) ने पहली बार पैकेट में मशरूम के बीज लगाए थे। उस समय उनकी उम्र मात्र 19 साल थी। लेकिन उस समय जिथू थॉमस को लगा कि वह ये सब समय व्यतीत करने के लिए कर रहा है। लेकिन धीरे-धीरे उनकी इस काम में रुचि बढ़ी और फिर उस काम को उन्होने अपनी इनकम का रास्ता बना लिया।
जिथू थॉमस आज इस काम को बड़ी सक्रियता और लगन के साथ करते है। साथ साथ बड़ा मुनाफा भी कमा रहे है। मशरूम की खेती के लिए बहुत ज्यादा जमीन की आवश्कयता नहीं है। जिथू और उनकी माँ ने भी इस काम को एक छोटे स्तर से शुरू किया था, जो धीरे-धीरे समय और जरूरत के हिसाब बढ़ा होता गया।
इन्टरनेट और किताबो से जुटाई जानकारी
इन्टरनेट एक ऐसा माध्यम है, जिससे कोई भी इंसान कुछ भी सीख सकता है। आज के दौर में लोग अपने ज्ञान को इसी से बढ़ा रहे है और यही काम जिथू ने किया। एक इंटरव्यू में बातचीत के दौरान बताया कि जब भी खाली समय मिलता था, तो मैं मशरूम की खेती के बारे में जानकारी जुटाता रहता था और कुछ न कुछ पढ़ता रहता था।
कभी ऑनलाइन तो कभी किताबों में और कभी मैग्जीन में अपने उपयोग की खबर ढूंढते रहता था। मेरी जानने की जिज्ञासा ने मेरा लगाव को और ज्यादा बढ़ा दिया। जिथू थॉमस की माँ लीना थॉमस बताती हैं मैं और बेटा जिथू थॉमस आज लगभग 5,000 वर्ग फुट में मशरूम की खेती कर रहे हैं।

इस कार्य को और बेहतर तरीके से करने के लिए हमने एक प्रयोगशाला भी बनाई है। जिससे वर्तमान समय में प्रतिदिन करीब 80-100 किलोग्राम यानि 1 क्विंटल तक मशरूम का उत्पादन कर रहे हैं। जिससे रोज 35 से 40 हजार रुपए की आमदनी रोज हो रही है।
प्रशिक्षण लेकर की मोटी कमाई
लीना थॉमस (Leena Thomas) जिनकी उम्र करीब 55 साल है। लंबे समय से इस काम को करती आ रही है। परंतु उस वक़्त उत्पादन की मात्रा इतनी अधिक नहीं थी। लीना ने जब जिथू की उत्सुकता को जाना। तो उन्होंने अपने बेटे का पूरा समर्थन किया।
जिथू ने कहा मै हमेशा से मशरूम उत्पादन करना चाहता था। इन दिनों मैं खेती के उत्पादन और नई तकनीकों और कर्मचारियों के साथ घुलने मिलने की कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन शुरू में मुझे खेती में किसी भी तरह की कोई भी जानकारी नहीं थी। इसलिए मैंने कृषि विज्ञान केंद्र कुमारकोम में कार्यशाला से भी जुड़ा जिसका मुझे बहुत फायदा हुआ।
400 रुपये किलो बिकता है मशरूम
एक किलो के लिए 400 रुपये तक जाने वाले मशरूम की बाजार दर भी इसे एक आकर्षक विकल्प बनाती है, फ्रेश कटे हुए मशरूम उसी दिन खुदरा विक्रेताओं को बेच दिये जाते हैं, जिनमें कोई दलाल नहीं होता है।
उन्हें ‘लीना के मशरूम’ के ब्रांड नाम के तहत 200 Gram पैकेज के रूप में बेचा जाता है। खेत उनके निकट की आठ महिलाओं को रोजगार भी प्रदान करता है। वे उत्पादन बढ़ाने के लिए दो और फार्म स्थापित करने पर भी काम कर रहे हैं।
नाबार्ड ने घोषित किया मशरूम गांव
भवानीपटना जिला मुख्यालय से करीब 10 किमी दूर कुटेनपाडर गांव में करीब 55 लोगो का मकान हैं, जिनमें से 40 आदिवासी समुदाय के लोग निवास करते है। नाबार्ड ने इसे मशरूम गांव घोषित किया है।



