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Hyderabad: आपको जानकर आश्चर्य होगा कि तुर्रम ख़ां कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि 1857 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई का एक हीरो था। तुर्रम ख़ां का असल नाम तुर्रेबाज़ ख़ान (Turrebaz Khan) था। मंगल पांडे (Mangle Pandey) ने बैरकपुर (Barrackpur) में जिस स्वतंत्रता के संग्राम की शुरुआत की थी, हैदराबाद में उसका नेतृत्व तुर्रम ख़ां ने किया था।
तुर्रम ख़ां का जन्म हैदराबाद (Hyderabad) के बेग़म बाज़ार (Begum Bazar) में हुए था। उनके शुरुआती ज़िंदगी के बारे में जानकारी बहुत कम है। मगर 1857 के संग्राम में उस समय उनका नाम उभरकर आया, जब उन्होंने जमादार चीदा ख़ान (Cheeda Khan) को छुड़ाने के लिए ब्रिटिश निवास स्थान पर आक्रमण की योजना बनाई।
दरअसल, जमादार चीदा ख़ान को विद्रोही सिपाहियों के विरुद्ध दिल्ली रवाना होने के लिए कहा गया था, मगर उन्होंने ऐसा करने से इन्कार कर दिया। सभी को आषा थी कि निज़ाम अंग्रेज़ों के विरुद्ध आज़ादी के इस संग्राम में साथ देगा। मगर वो ग़द्दार निकला।
जब जमादार चीदा ख़ान अपने 15 सैनिकों के साथ निजाम के पास सहायता लेने पहुंचा, तो निजाम के मंत्री ने धोखे से उन्हें गिरफ़्तार कर ब्रिटिश रेजीडेंसी में क़ैद कर लिया। तुर्रम खां ने अपने साथी मौलवी अलाउद्दीन के साथ मिलकर 5,000 जांबाज़ लड़ाकों की सेना को तैयार किया। इसमें कई अरब, छात्र और अन्य विद्रोही सम्मिलित थे।
योजना थी कि अचानक से ब्रिटिश रेजीडेंसी पर हमला बोला जाएगा। तुर्रम ख़ां (Turram Khan) को भरोसा था कि अचानक हुए हमले से अंग्रेज़ों को संभलने का अवसर नहीं मिलेगा। उसकी सहायता करने के लिए बब्बन ख़ान और जयगोपाल दास (Jai gopal Das) ने रेजीडेंसी हाउस के सामने के दो मकान भी ख़ाली कर दिए।
मगर तुर्रम ख़ां की इस योजना की खबर अंग्रेंज़ों को मिल चुकी थी, क्योंकि निजाम के वजीर ने धोखेबाजी करते हुए अंग्रेजों को पहले ही ख़बर दे दी थी। अंग्रेज़ सैनिक बंदूकों और तोपों को तैयार कर तुर्रम ख़ां और उसके साथियों के आने का इंतज़ार कर रहे थे।
1857 Freedom Fighter From Hydrabad Turram Khan (Turrebaz Khan) pic.twitter.com/e2jdaKSq3b
— sanatanpath (@sanatanpath) October 19, 2021
17 जुलाई, 1857 की रात को तलवारों और लाठी-डंडों के साथ तुर्रम ख़ां ने अपने साथी मौलवी अलाउद्दीन और अन्य विद्रोहियों को लेकर हमला बोला। पूरी रात ताबडतोड़ गोलीबारी हुई और सुबह 4 बजे तक विद्रोहियों को अंग्रेज़ सैनिकों ने बुरी तरह हरा दिया।
ब्रिटिश रेजीडेंसी पर हुए आक्रमण में कई जांबाज़ स्वतंत्रता सेनानी वीरगति को प्राप्त हो गए। मगर अंग्रेज़ तुर्रम ख़ां को वहां पकड़ने में विफल रहे। हालांकि, निजाम के मंत्री तुराब अली ख़ान ने तुर्रम ख़ां का पता अंग्रेज़ों को बता दिया।
Remembering Turrum Khan: It was on January 24, 1859 that #freedom #fighter Turrebaz Khan, popularly known as Turrum Khan, was killed and his body hanged from lamp post in #SultanBazar. He led attack on #British #Residency in July 1857. #FirstWarOfIndependence #Hyderabad #heroes pic.twitter.com/xpFnxv3921
— Syed Akbar (@SyedAkbarTOI) January 20, 2021
हैदराबाद कोर्ट में तुर्रम ख़ां पर मुक़दमा चलाया गया उसे अपने बाकी सहयोगी का पता बताने के लिए कहा गया, मगर उसने इन्कार कर दिया। ऐसे में तुर्रम ख़ां को काला-पानी की सज़ा सुना दी गई। उन्हें जीवनभर काल कोठरी में सड़ने के लिए अंडमान भेजने की तैयारी प्रारम्भ हुई। हालांकि, अंग्रेज़ उन्हें अंडमान भेज पाते, इसके पहले ही 18 जनवरी 1859 को तुर्रम ख़ां अंग्रेज़ों की गिरफ़्त से फ़रार हो गए।
अंग्रेज़ों ने तुर्रम ख़ां पर 5,000 रुपये का इनाम रखा। हर तरफ उन्हें पकड़ने के लिए सैनिक गश्त करने लगे। कुछ वक़्त बाद एक तालुकदार मिर्ज़ा कुर्बान अली बेग (Mirza Qurban Ali Baig) ने तूपरण के जंगलों में छल से तुर्रम ख़ां को हमेशा के लिए सुला दिया।
The memorial at Kothi in Hyderabad built in memory of valiant freedom fighter "Turrebaz Khan" and others who attacked Residency on July 17, 1857 during First War of Indian Independence. pic.twitter.com/bPSXkKjN0c
— sanatanpath (@sanatanpath) October 19, 2021
इतिहासकारों के अनुसार तुर्रम ख़ां के शव को रेजीडेंसी में लाकर बिना कपड़ो के पेड़ से लटका दिया गया था। आज तुर्रम खा बहादुरी की मिसाल है। इसका नाम मज़ाक में नहीं, बल्कि सम्मान में लेना चाहिए। अगर अकोइ आपको कहे की खुद को तुर्रम खां समझते हो, तो समझो की आप बहादुर (Brave) हो।



