Tuesday, August 4, 2020
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नेपाल से भारतियों ने मिथिला क्षेत्र वापस माँगा, सीता हमारी बेटी है, अब नया नक्शा बनाओ

Nepal India China Modi
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Patna/Bihar: अभी के वक़्त में भारत और नेपाल के रिश्तों में एक नया दौर शुरू हो गया है। नेपाल द्वारा दर्शाये गए नए नक़्शे में भारतीय क्षेत्र को नेपाल के क्षेत्र में देखिये जाने के बाद अब भारत के मिथिला क्षेत्र में लोग नेपाल से वापस मांग करने लगे हैं। अब भारतीयों की मांग के मुताबिक़ नेपाल के कब्जे वाले क्षेत्र मिथिला को वापस भारत में मिला दिया जाये और फिर नेपाल अपना नया नक्शा पारित करे।

आपको बता दे की मिथिला क्षेत्र भारत और नेपाल दोनों देशों के मध्य बंटा हुआ है। यह बात ब्रिटिश राज के टाइम की है, जब 1816 में अंग्रेजों ने मिथिला का आधा क्षेत्र नेपाल के गोरखा राजाओं को दे दिया था और कुछ क्षेत्र भारत के बाहर के पास है। ऐसे में हालिया नेपाल की हरकतों के बाद अब बिहार की जनता अपने मिथिला क्षेत्र को वापस लेने की मांग कर रहे है।

अब इसी सिलसिले में भारतीय मिथिला क्षेत्र के लिए आवाज उठाने वाले कह तहे है की अब वक़्त आ गया है की जनकपुर को भारत में फिरसे मिलाकर मिथिला क्षेत्र को पूरा कर लिया जाए। अब देश और खासकर के बिहार के लोगो को भय है की चीन के इशारे पर चल रही भारतविरोधी कम्युनिस्ट नेपाली सरकार अब जानकी मंदिर को दरकिनार करके ऐसा ना बना दे की भारतीय भक्त जानकी मंदिर दर्शन को भी ना जा सकें। लोगो का तर्क है की भारत को नेपाल से मिथिला का वह हिस्सा वापस लेे लेना चाहिए।

करोड़ों मैथिलों की धार्मिक मान्यता के साथ खिलवाड़

देश की जनता और जानकरों का मानना है की चीन परस्त नेपाली सरकार ना भारत विरोधी होने के साथ साथ करोड़ों मैथिलों की धार्मिक मान्यता के साथ भी खिलवाड़ कर रही है। भारत हमेशा से नेपाल का एक मित्र राष्ट्र रहा है, परन्तु नई नेपाली कम्युनिस्ट सरकार भारत विरोधी है और वामपंथी विचारधारा वाली है। ऐसे में भारत सरकार को भी एक नया नक्सा जारी करके नेपाल के कब्जे वाले मिथिला क्षेत्र को अपने भारतीय क्षेत्र में दर्शा देना चाहिए। इसे कहते है जैसे तो तैसा।

आपको बता दें की ब्रिटैन की ईस्ट इंडिया कम्पनी ने 1816 में नेपाल के राजा से हुई सुगौली संधि के 200 वर्ष 2016 में ही पूरे हो चुके हैं। ये संधि भारत की धरती पर दो विदेशियों के बीच हुई थी, परन्तु इसके चलते मैथिल परिवार ही एक दूसरे के लिए विदेशी हो गए और इनकी सरहरेब अलग अलग हो गई। इस संधि में विदेशी ईस्ट इंडिया कम्पनी और नेपाली राजा के राजगुरु गजराज मिश्रा ने बहरतियों के साथ बड़ी नाइंसाफी कर दी। दो विदेशियों के संधि का नुक्सान मिथिला के बंटवारे से हुआ है।

इस बेतुकी संधि के आज करीब 200 साल हो चुके हैं, परन्तु किसी सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। आज के समय में नेपाल में मैथिलों के साथ भेदभाव होता है और उन्हें मधेशी तक कहा जाता है। उन्हें अनेक सुविधाओं से भी अलग किया गया है। ऐसे में आज मिथिला क्षेत्र भी भारत को अपना बताने का मौका आ गया है।

अब जब नेपाल की सरकार मित्रता नहीं निभा रही तो ऐसे में भारत सरकार को भी मित्रता भूलकर अपना क्षेत्र वापस लेव ले चाहिए, ऐसी मनंग अब बिहार में उठ रही है। अब सुनने में आया है की नेपाल ने अपने स्कूल में चीनी भाषा मंदारिन (Mandarin) पढ़ाये जाने को जरुरी कर दिया है, क्योंकि चीन ने नेपाल के शिक्षकों की तनखाह देने का ऑफर दिया।

आपको बता दे की अब भारत ने नेपाल पर अपना रुख सख्त कर दिया है। सूत्रों के अनुसार भारत ने साफ कर दिया है कि नेपाल की हरकतों ने मुश्किल स्थिति पैदा कर दी है और अब बातचीत के लिए सकारात्मक माहौल बनाने की जिम्मेदारी नेपाल सरकार की है। नेपाल ने भारत के विरोध के बावजूद अपने विवादित नक्शे से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक को संसद में पेश किया। इस नक्शे में भारत के तीन इलाकों लिपुलेख, लिंपियाधुरा और कालापानी को शामिल किया गया है। नेपाली संसद के निचले सदन में इसे मंजूरी भी मिल चुकी है।

नेपाल की संसद ने ऐसा नक्शा पास किया

भारत ने कहा है कि अभी के दिनों में नेपाल की हालिया सरकार ने राजनीतिक कारणों से ऐसा बेतुका फैसला लिया हैं। भारत ने दोनों देशों के बीच सीमा के विवाद को सुलझाने के लिए कई बार नेपाल के सामने बातचीत का प्रस्ताव रखा, परन्तु इसकी अनदेखी करते हुए नेपाल की संसद ने ऐसा नक्शा पास किया जिस पर न सिर्फ भारत को आपत्ति है, बल्कि इसका कोई आधार भी नहीं रहा है।

भारत के लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को लेकर नेपाल के चल रहे विवाद का असर अब उत्तराखंड और नेपाल की सीमा पर पंचेश्वर में प्रस्तावित बिजली और सिंचाई के मेगा प्रोजेक्ट पर भी पड़ सकता है। नेपाल के कुछ भारत विरोधी लोग इस संधि को खारिज करने की मांग में हैं। हालांकि, नेपाल सरकार ने इस संधि का बचाव किया है।

नेपाल की मीडिया के मुताबिक वहां की जनता समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व विदेश मंत्री उपेंद्र यादव ने नेपाल के नए नक्शे पर प्रतिनिधि सभा में बोलते हुए कहा कि, नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट नेता महाकाली संधि पर देश से माफी मांगें। यादव ने कहा कि, दोनों देशों की सीमा विभाजक महाकाली नदी का उदगम ही इस संधि में गलत बताया गया है तो, यह संधि क्यों की गई। उन्होंने इस संधि को खारिज करने की मांग की।


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