Thursday, September 24, 2020
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सेना में शहीद पिता का बेटा जब लेफ्टिनेंट बना, तो माँ ने 23 साल का गम भुलाकर कही यह बात

Manoj Kumar Yadav Indian Army
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Image Credits: Twitter

Dehradun: भारतीय सेना और उनके जवान अनहोनी को होनी करने के लिए ही जाने जाते हैं। एक भारतीय फौजी का पूरा परिवार भी अप्रतयक्ष रूप से देश की सेवा करता रहता है। देश के वीर जवानों की पत्नियां भी किसी योद्धा से कम नहीं होती है। आज इस किस्से को जानकार आप इस बात से एग्री करेंगे। आज से 23 साल पहले भारतीय सेना का एक जवान शहीद हुआ था। फिर समय के पहिये ने अपनी चाल चली और 23 साल बाद शहीद हुए पिता की रेजिमेंट में ही बेटा अफसर बनकर आ गया।

आज इस सेना के अफसर पर आपको जरूर गर्व होगा, परानु इस बेटे की मां ने भी उतनी की जंग की, जितनी के बेटे ने कड़ी मेहनत। इस बेटे की माँ ने 23 साल तपस्या की और बेटे को पाने पति की रेजिमेंट में अफसर बनते देखा। यह कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है, वैसे भी फिल्मे हमारे वीर जवानों पर ही बनती है। लोग जवानो को भूलकर उस जवान की भूमिका निभाने वाले हीरो को याद करते हैं।

संघर्ष के 23 साल का लम्बा अंतराल

आपको बता दे की हरियाणा के हिसार के जीतपुरा गांव निवासी मनोज कुमार यादव हाल ही में देहरादून स्थित इंडियन मिलिट्री अकादमी से कमीशंड होकर लेफ्टिनेंट बन गए हैं। सबसे अच्छी बात यह रही की मनोज कुमार यादव को उनकी पहली पोस्टिंग उनके पिता शहीद चंद्र सिंह की रेजिमेंट 317 फील्ड आर्टलरी में हासिल हुई है। इस मुकाम पर पहुँचाने उन्हें में 23 साल का लम्बा अंतराल लगा।

एक शहीद के परिवार के लिए यह भी किसी जंग से कम नहीं है। कितना घैर्य और परिश्रम चाहिए इस उपलब्धि को हासिल करने में। मनोज यादव के परिवार में मां सुशीला देवी और बड़ी बहन सीमा हैं। पहली बार पासिंग आउट परेड में मनोज का परिवार नहीं आ सका। परन्तु उनकी माँ ने वीडियो पर अपने बेटे को अफसर बनते हुए देखा। यह सपना साकार होते देख मां की आंखें भर आईं और उन्होंने कहा कि मेरी 23 साल की मेहनत सफल हो गई।

मनोज के पिता चंद्र सिंह सेना के ऑपरेशन रैनो का हिस्सा थे

लेफ्टिनेंट मनोज यादव की मां सुशीला देवी ने मीडिया में बताया कि 7 जुलाई 1997 में मनोज के पिता चंद्र सिंह सेना के ऑपरेशन रैनो का हिस्सा थे। यह ऑपरेशन भारत के उत्तर पूर्वी राज्य अगरतला में चलाया गया था। इस ऑपरेशन के तहत अल्फा उग्रवादियों का सामना करने हुए चंद्र सिंह शहीद हो गए थे। उस वक़्त मनोज की उम्र केवल डेढ़ साल थी।

मनोज की माँ ने पति के सिखाये हुए मार्ग पर चलने का फैसला किया और अपने बेटे को हिसार के आर्मी स्कूल में दाखिला करवा दिया। माँ ने जीवन यापन के लिए निजी संसथान में टीचर की नौकरी की। उन्होंने पाने दोनों बच्चों को अच्छी शिक्षा देते हुए बड़ा किया। वह बताती हैं कि उनके मन में शुरू से ही इच्छा थी कि बेटा आर्मी में अफसर बने और देश की सेवा करे। आज वह दिन आ गया है।

हमारे सूत्रों के मिली जानकारी के अनुसार आर्मी स्कूल से 12th की पढाई पूरी होने के बाद मनोज ने BA पॉलिटिकल साइंस की पढ़ाई शुरू की। फिर 2013 में NDA के लिए चयनित हुए। इसके बाद 2017 में एयरफोर्स और 2018 में नेवी में चयन हुआ। इन तीनों में मनोज आखिरी स्टेज पर असफल हो गए।

इसके बाद और अधिक मेहनत करने के बाद आके ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी चेन्नई में मनोज का चयन हुआ और आइएमए IMA का इंटरव्यू निकालने ने वे इस बार सफल रहे। फिर चेन्नई से देहरादून IMA में आये और अब लेफ्टिनेंट बन गए हैं। जब लोगो ने मनोज की बात की तो उन्होंने अपनी की कामयाबी का श्रेय उनकी मां को दिया। उनकी माँ ने उन्हें हमेशा सेना में जाने के लिए प्रेरित किया।


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