Friday, September 25, 2020
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भारतीय सेना के रिटायर्ड गोरखा फौजी जम्मू-कश्मीर में घर बना रहे, इतने हज़ार बसने को तैयार

Kashmir Gorkha Domicile
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Image Credits: Twitter

Jammu/Kashmir: जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 की समाप्ति का असर और फायदा दिखने लगा है। जिस वजह से घाटी से धारा 370 हटाई गई थी। अब उसका रिजल्ट मिलने लगा है। ज्ञात हो की केंद्र की मोदी सरकार ने आर्टिकल 370 के हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में नए डोमिसाइल कानून (संशोधन) को मंजूरी दी थी।

इसके अंतर्गत उन लोगों को जम्मू कश्मीर के स्थायी निवासी के रूप में मान्यता दी गई थी, जो कि 15 साल से जम्मू-कश्मीर में रह रहे हों या जिन लोगों ने यहां पर सात साल तक पढ़ाई की हो या फिर जम्मू कश्मीर के स्कूलों में 10th एवं 12th की परीक्षा में सम्मिलित हुए हो। जम्मू-कश्मीर डोमिसाइल कानून (Jammu Kashmir Domicile Certificate Law) के तहत 15 साल से रहने वाले नागरिकों को यह सर्टिफिकेट हासिल करने का अधिकार मिल जाता है।

जम्मू कश्मीर प्रशासन ने यहां कई सालों से रह रहे लोगों को यहां का डोमिसाइल सर्टीफिकेट जारी करने का काम शुरू किया है। अभी तक यहां 6600 लोगों को यह सर्टिफिकेट जारी हुए हैं, इन्हें हासिल करने वालो में अधिकतर गोरखा समुदाय के लोग हैं। बीते एक सप्ताह से जब से जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने मूल निवासी प्रमाण पत्र देने का काम शुरू किया है, तब से अभी तक लगभग 6600 लोगों को यहां का मूल निवास प्रमाण पत्र हासिल हो चुका है।

घाटी के मूल निवास प्रमाण पत्र हासिल करने वालों में बड़ी संख्या में गोरखा समुदाय के भारतीय सेना के रिटायर्ड सैनिक और अफसर (Retired Gorkha Soldiers of India) हैं। राज्य का मूल निवास प्रमाण पत्र (Domicile) nहासिल करने के बाद ये लोग यहां प्रॉपर्टी खरीद कर घर बना सकते हैं और इस केंद्र शासित प्रदेश में नौकरियों के लिए आवेदन भी कर सकते है।

मीडिया की रिपोर्ट में बताया गया है की जम्मू के एक अधिकारी ने मीडिया को बताया कि अभी तक 5900 से ज्यादा सर्टिफिकेट जारी किए जा चुके हैं। कश्मीर में लगभग 700 सर्टिफिकेट जारी किए गए हैं। इनमें से अधिकतर सेनानिर्वृतय गोरखा सैनिक और ऑफिसर ही हैं। खबर के मुताबिक़ केवल एक ही तहसील में ही अब तक ऐसे गोरखा समुदाय के लगभग 2500 लोग सर्टिफिकेट प्राप्त कर चुके है, जिन्होंने भारतीय सेना में अपनी सेवा दी है। उसके अलावा लगभग 3500 लोगों ने इसके लिए आवेदन किया था। इसके अलावा अन्न लोग अन्न समुदाय से है।

एक रिपोर्ट में बताया गया है की वाल्मीकि समुदाय के लोगों को जम्मू कश्मीर में 1957 में पंजाब से लाकर बसाया गया था। यह काम तब किया गया था जब राज्य के सफाई कर्मी हड़ताल पर चले गए थे। जम्मू कश्मीर प्रशासन ने 18 मई को मूल निवास प्रमाणपत्र जारी करने के संदर्भ में नॉटिफिकेशन जारी किया था।

इस नॉटिफिकेशन के नियमों के मुताबिक़, यदि मूल निवास प्रमाणपत्र जारी करने वाला अधिकारी 15 दिन के अंदर इसे जारी नहीं करता है, तब उस अधिकारी पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगेगा। इन नियमों के अनुसार जो लोग मूल रूप से जम्मू-कश्मीर के नहीं हैं, परन्तु यहां 15 साल रह रहे हैं, उनकी संताने भी इसे हासिल करने के हकदार हैं। अभी तक करीब 33,000 आवदेन आ चुके हैं। हमें एवरेज 200 आवेदन हर दिन आ रहे हैं।

आपको बता दे की 68 साल के प्रेम बहादुर ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, ‘मेरे पिता हरक सिंह ने यहां तब के शासक महाराजा हरि सिंह की सेना में नौकरी की थी। इसके बाद मेरा भाई ओमप्रकाश और मैंने गोरखा राइफल्स जॉइन की। मैं बतौर हवलदार रिटायर हुआ और भाई लेफ्टिनेंट हैं।’ उन्होंने बताया कि सेना से रिटायर होने के बाद हम हर साल यहां स्थायी आवास प्रमाणपत्र के लिए अप्लाई करते थे। सरकार के इस निर्णय से गोरखा समुदाय का एक बहुत लंबा संघर्ष खत्म हुआ है। गोरखा समुदाय के लोग यहां करीब 150 सालों से रह रहे हैं। उनका कहना है की भारत की सेवा करने ओर आज उन्हें बहुत गर्व हो रहा है।


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